श्रोता: सर, हमारा मन बुराइयों को बहुत जल्दी स्वीकार करता है और अच्छाइयों को बहुत देरी से स्वीकार करता है। ऐसा क्यों? ऐसा क्या अंतर है इन दोनों में?
वक्ता: हम अच्छाई को देर से क्यों स्वीकारते हैं? बुराई की तरफ क्यों भागते हैं? मन बुराई की तरफ क्यों आकर्षित रहता है, क्यों सोख लेता है और अच्छाई से क्यों बचता है?
बेटा, इस बात में तथ्य नहीं हैं। अगर तुम ध्यान से देखो तो हमने जिसको अच्छा-बुरा कह रखा है, मन दोनों को ही स्वीकार करने को तत्पर रहता है। बल्कि दोनों को समान परिमाण में लेने को तैयार है। तुम ठीक उतनी ही अच्छाई को स्वीकारते हो, जितनी कि बुराई को स्वीकारते हो। बात सुनने में अजीब लग रही है ना।
कौन आदमी कितनी अच्छाई को स्वीकार रहा है ये बिलकुल इसपर निर्भर करता है कि वो बुराई को भी कितना सोख ले रहा है। क्योंकि अच्छाई और बुराई, जिनको हम कहते हैं वो एक ही द्वैत के दो सिरे हैं। दो ऐसे विपरीत हैं जो एक दूसरे के बिना चल नहीं सकते। उदाहरण के लिए, तुमको मीठे वचन बोलने की ज़रूरत ही तब पड़ेगी, जब तुमने पहले कड़वे खूब बोल दिए हों।
कभी तुमने देखा है कि तुम सबसे ज्यादा मीठा कब बोलते हो? जब तुमने किसी को चोट पहुँचा दी है और अब तुम्हें उसे सांत्वना देनी है, उसे वापस लाना है। मीठा बोलने की ज़रूरत ही इसीलिए है कि कड़वा बोल दिया गया है।
सबसे ज्यादा पुण्य किनको करने पड़ते हैं? दान दो, गंगा नहाओ; जो सबसे पापी होते हैं। अब इतना पाप इकट्ठा कर लिया है तो पुण्य तो करना पड़ेगा ना। बात समझ रहे हो?

