कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।१३.२।।
अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ(अर्थात् नहीं) हैं, वाणी के दुःख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय -१३ , श्लोक – २)
आचार्य प्रशांत: कभी शरीर से दुख हैं, कभी वाणी से दुख हैं, कभी मन से दुख हैं। इन सब का त्याग करके, मैं पुरुषार्थ में स्थित हूं, सुखपूर्वक।
त्याग कभी पहले नहीं आएगा। त्याग तुम करोगे कैसे? तुमने जों कुछ भी आधा तिया पकड़ रखा हैं, जब वही तुम्हारी सारी संपत्ति हैं तो तुम उसे त्यागोगे कैसे? सुना हैं ना, अक्सर कहता हूं तुमने दो रूपए का सड़ा हुआ नोट भी मुट्ठी में भींच रखा हैं, तो तुम उसे कैसे तयागोगे, अगर तुम्हें यह मान्यता हैं कि दो रुपए का नोट ही मेरी पूरी संपत्ति हैं। कैसे छोड़ोगे? दो रुपए का सड़ा हुआ नोट हैं, पर क्या छोड़ सकते हो अगर तुम्हें यह लगें कि तुम्हारे पास इस दो रुपए के अतिरिक्त और कुछ नहीं - छोड़ पाओगे? अरे! यह मेरी पूरी ज़ायदाद हैं, कैसे छोड़ दूं?
तुम कुछ नहीं त्याग सकते। त्यागने के लिए ऐश्वर्य का भाव होना चाहिए। त्यागने के लिए छलछलाता ज़ाम होना चाहिए - इतना हैं, और कितना मांगे!





