श्रोता: सर, आपके अनुसार जिंदगी कैसे जीनी चाहिए? कैसे एन्जॉय करना चाहिए?
वक्ता: आदमी अकेला ही है जो पूछता है कि कैसे ‘एन्जॉय’ करें| इंसान अकेला ही ऐसा है जिसे अलग से कुछ करना पड़ता है, जिसे वो एन्जॉयमेंट का नाम दे सके| वो कहता है ये सब तो मेरी सामान्य गतिविधियाँ हो गयी, अब इनसे हट करके कुछ और क्या करूँ अपने एन्जॉयमेंट के लिए|
अब अस्तित्व को देखो कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे कुछ अलग करना पड़ता हो, आनंद के लिए| ‘एन्जॉय’ माने आनंद| सब यूँ ही मस्त हैं, आनंदित हैं, जैसे हैं उसी में; कुछ और नहीं करना पड़ता, कुछ भिन्न नहीं होना पड़ता| किसी अलग पटरी पर नहीं जाना पड़ता|
आनंद कुछ करने में नहीं है कि तुम कोई ख़ास काम करोगे तो उसमें तुम्हें आनंद मिल जाएगा| आनंद में, बहुत सारे काम होते हैं आम, खास, छोटे या बड़े जो भी तुम उन्हें नाम देना चाहो|
किसी काम से तुम्हे आनंद नहीं मिल सकता| आनदं पहले आता है, काम बाद में आता है|
इंसान अकेला है जिसे ये भ्रम रहता है कि कुछ करके आनंद मिल जाएगा| यही रहता है ना तुमको कि ऐसा क्या करें कि आनंद उपलब्ध हो जाए| यही सवाल पूछते हो ना? ये सवाल ही मूलतः गलत है| जो तुम्हारे पास है नहीं, वो कुछ कर के हासिल नहीं हो सकता| कर-कर के जो हासिल होता है वो सब वही हैं, जो तुम्हारे मन की ही उपज हैं| कोई मटेरियल

