श्रोता: सर ये, ‘द सुप्रीम इज़ द यूनिवर्सल साल्वेंट’?
वक्ता: ‘द सुप्रीम इज़ द यूनिवर्सल साल्वेंट’। बहुत बढ़िया; कुछ नहीं है जो उसमें गल नहीं जाता, कुछ नहीं है जो उसमें लय नहीं हो जाता। हम ये तो हर समय बोलते रहते हैं कि “द सुप्रीम इज़ द अल्टीमेट सोर्स ” क्यूँकी देखो अहंकार को जन्म बड़ा प्यारा लगता है, तो उसको हम परम पिता तो बोलते रहते हैं, सोर्स माने पिता, “इट इज़ द अल्टीमेट सोर्स ” और ये बोलने में बड़ा मज़ा आता है। पर वो जो परम है, वो महामृत्यु भी है सब उसी में गल जाता है, सब उसी में वापस चला जाता है। पर क्या तुमने गौर किया कि हमने कभी उसे महामृत्यु नहीं बोला? हम उसे स्रोत तो बोलते रहते हैं, पर वो स्रोत ही नहीं है ,सिंक भी है। उसमें से सब उदय तो होता ही है, सब उस ही में वापस भी जाता है। ‘प्रलय’; प्रलय यानी लीन हो जाता है उसमें, उस ही को प्रलय कहते हैं।
महामृत्यु; इसी लिए ज्ञान को महामृत्यु भी कहा गया है, ज्ञान को, गुरु को महामृत्यु भी कहा गया है। शरीर तो जो मरता है वो छोटी-मोटी मौत है पर ज्ञान जो देता है तुम्हें वो महामृत्यु है, क्यूँकी तुम परम स्रोत में वापस चले जाते हो। तो तुम यहाँ क्यूँ आए हो?
श्रोता: मरने।
श्रोता: सर ये, ‘द सुप्रीम इज़ अ ग्रेट हार्मोनी’?
वक्ता: एक आदमी को हटा दो, पूरी दुनिया में कुछ भी कनफ्लिक्ट

