आत्मचैतन्यमश्रित्य देहेन्द्रियमनोधिय:। स्वकीयार्थेषु वर्तन्ते सूर्यालोकं यथा जना:॥
आत्मचैतन्य के आश्रय में ही शरीर, इंद्रियाँ, मन और बुद्धि अपनी अलग-अलग क्रियाएँ करते हैं, जैसे सूर्य के प्रकाश में मनुष्यों की क्रियाओं का संपादन होता है।
—आत्मबोध, श्लोक २०
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमन। श्लोक से समझ आया कि आत्मा के आश्रय में शरीर की सारी क्रियाओं और सूर्य के प्रकाश के आश्रय में मनुष्य की सारी क्रियाओं का संपादन होता है। कृपया प्रकाश डालें। धन्यवाद!
आचार्य प्रशांत: समझाया जा रहा है कि आत्मा कोई वस्तु नहीं है, कोई विषय नहीं है। जैसे इस कक्ष में बहुत सारी चीज़ें दिखाई पड़ रही हैं प्रकाश में, पर प्रकाश अपने-आपमें कोई चीज़ नहीं है। सब चीज़ें दिखाई पड़ रही हैं प्रकाश में, लेकिन प्रकाश अपने-आपमें कोई चीज़ नहीं है। चीज़ माने विषय, वस्तु।
तो आत्मा क्या है?
आत्मा वो है जिसके होने से सब हो रहा है। सब हो रहा है, माने कहाँ हो रहा है? सब गतियाँ जहाँ हैं, उसको कहते हैं चेतना। सब पदार्थ, सब वस्तुएँ, सब विषय जहाँ हैं, उसको कहते हैं चेतना।


