डरते हो क्योंकि भूले बैठे हो || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्नकर्ता: आप ये जो बातें बताते हैं वो एक व्यक्ति के लिए तो सही हैं, वो इनको व्यवहार में ला सकता है, या सीख सकता है, अंदर से खुद ऐसा बना सकता है, लेकिन एक समूह में आने के बाद वो सारी बातें निरर्थक-सी हो जाती हैं। तो ये अलग बात है कि सब जानते हैं कि ये सही बातें हैं, लेकिन कोई इन्हें फौरन व्यवहार में नहीं लाना चाहता।
जैसे अगर आप सेना में जाकर ये बात बोलेंगे कि ये सीमाएँ क्यों बना रखी हैं, तो वहाँ कई लोगों को आपकी ये सारी बातें निरर्थक लगेंगी, वो ये मानने को तैयार ही नहीं होंगे। मार्कोस कमांडोज़ होते हैं जो देश की सुरक्षा के लिए जान देते हैं। उनको एक बिल्ला दे दिया जाता है कि यही तुम्हारी पहचान है, यही तुम्हारी वर्दी है, इसकी इज़्ज़त रखनी है। उनके लिए वो वर्दी ही इस देश की पहचान है, तो वो उस वर्दी तक के लिए जान दे सकते हैं। इन्हें ये बातें कि, "सीमाएँ नहीं होनी चाहिए", ये निरर्थक लगेंगी। मैं ये जानना चाहता हूँ कि इन बातों की क्या सार्थकता है? क्या सभी बातों का एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: नहीं। तुमने ठीक कहा। बिलकुल ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग इन बातों से सहमत न हों। पर इससे तुम्हें क्या फर्क पड़ रहा है?
प्र: सर हम भी तो इसी…
आचार्य: ‘हम’ नहीं, अपनी बात करो। तुम्हें क्या फर्क पड़ रहा है?
(मौन)


