आविद्यकं शरीरादि दृश्यम बुद्बुदवत्क्षरम। एतद्विलक्षणं विद्यादहं ब्रह्मेति निर्मलं॥
देहानयत्वान्न मे जन्म जराकाशर्य लयादयः। शब्दादिविशयैः सङ्गो निरीन्द्रियतया न च॥
शरीर और इससे सम्बंधित सभी वस्तुओं का जन्म अज्ञान से होता है, ये केवल दृश्य हैं और पानी के बुलबुले की तरह नाशवान हैं, इन सबसे विलग अपने-आपको निर्मल ब्रह्म जानो।
मैं शरीर से विलक्षण हूँ, अतएव जन्म, बुढ़ापा, क्षय और मृत्यु इत्यादि परिवर्तन मेरे नहीं हैं। मैं बिना इंद्रियों के हूँ, अतः शब्दादि विषयों से भी मेरा कुछ संबंध नहीं है।
—आत्मबोध, श्लोक ३१-३२
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। होली के दिन पड़ोस में एक अंतिम यात्रा में शामिल हुआ। तत्वबोध का पाठ करने के कारण डर नहीं था। वहाँ यही दोहराया जा रहा था कि, "राम नाम सत्य है, सत्य बोलो मुक्ति है।" पहले भी कई बार शामिल हुआ हूँ और अज्ञानवश इसका अर्थ कुछ भयानक ही निकालता था। जैसा कि आपने बताया था कि हम सब मुक्ति के विषय में भयानक छवियाँ बना रहे हैं, यह उस अंतिम शवयात्रा में समझ आया। वहाँ उपस्थित सभी लोग मुक्ति के नाम पर भयभीत ही थे। कृपया शरीर से मुक्ति का सही अर्थ स्पष्ट करें, मार्गदर्शन करें।


