दूर के लक्ष्यों में धूर्तता || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्न: सर, प्रश्न यह था कि हम अपना ऑब्जेक्टिव एक लाइन में कैसे लिखेंगे रिज्यूम के अन्दर।
वक्ता: तो सवाल यह है कि सी.वी पर क्या लिखना है या यह है कि पता नहीं है कि क्या करना है?
श्रोता: सर, पता नहीं है क्या करना है।
वक्ता: तो उसी की बात करें कि पता नहीं है कि क्या करना है। रिज्यूम, सी.वी, वगैरह यह सब तो छोटी चीज़ें हैं। हैं ना? अगर अपनी क्लैरिटी हो कि करना क्या है, तो फिर इनकी कोई खास एहमियत रह नहीं जाती कि क्या लिखें क्या ना लिखें! सही बात तो यह है कि ऐसा भी कोई नियम नहीं है कि आपको लिखना ही है। बहुत सी.वी होते हैं जिन पर आप ऑब्जेक्टिव नहीं लिखते हैं तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैंने कभी कोई ऑब्जेक्टिव नहीं लिखा। मैंने भी सी.वी बनाए थे। कभी कोई ऑब्जेक्टिव वगैरह लिखा नहीं। दो बातें हैं मूल प्रश्न पर कि पता ही नहीं है कि क्या करना है। तुमको बार-बार यह इसलिए लगता है कि पता नहीं कि क्या करना है, क्योंकि तुम सोचते हो कि कुछ बहुत बड़ा है करने के लिए।
समझना बात को।
जो कि कई सालों बाद कभी सुदूर भविष्य में तुम्हारे हाथ लगेगा, कोई बहुत बड़ी चीज़ जो करने के लिए है ही और तुमने देखा भी यही है की लोग कहते हैं की लम्बे लक्ष्य हों, बड़ी सोच हो और फिर चलते जाओ, चलते जाओ उसको हासिल करो। अब दूर का जितना लक्ष्य बनाओगे वह उतना ज्यादा अस्पष्ट होगा। है ना? लेकिन फिर भी हमें ऐसा लगता है कि कोई मजबूरी है कि बहुत दूर का कोई लक्ष्य होना ही चाहिए। बहुत आसान है देख पाना कि लक्ष्य क्या है ? जो सामने है वही लक्ष्य है और उसमें कोई स्पष्टता की ज़रूरत नहीं क्योंकि स्पष्ट ही है , सामने ही है लेकिन वहाँ तुम्हें दिक्कत आ जाती है। दिक्कत यह आ जाती है कि वह बहुत छोटा लगता है। दिक्कत यह लगती है कि मैं किसी और को कैसे बताऊँ? यह तो अभी की बात है। बात लम्बी चौड़ी होनी चाहिए। बात दूर तक जानी चाहिए। बात बड़ी प्रतीत होनी चाहिए। बात ऐसे होने चाहिए कि कहीं दूसरे उसे पढ़ें तो कहें -“वाह! इस आदमी में कुछ जान है और उस आदमी में जान क्या है? उसमें इतनी जान है कि उसने कुछ बहुत दूर का पकड़ रखा है। तो तुम पूछ रहे हो कि जानते ही नहीं कि लक्ष्य क्या है। मैं कह रहा हूँ कि जान पाओगे भी नहीं अगर तुमने लक्ष्य वही लम्बे चौड़े भविष्य में बहुत आगे के बनाए रखे हैं। अभी यहाँ बैठे हो तो क्या लक्ष्य है ? हद से हद यह कह सकते हो कि बात को सुन रहे हो, हद से हद यह कह सकते हो कि कुछ सीखना चाहते हो, समझना चाहते हो। तो ठीक है, तुम जीवन में जहाँ भी जा रहे हो चाहे कोई काम कर रहे हो, चाहे मिल रहे हो किसी से क्या इतना ही कह देना काफ़ी नहीं है कि ” भई, समझना चाहते हैं। जिंदगी को देखना चाहते हैं, इस काम के करीब आना चाहते हैं, बस इतना कह देना काफ़ी है। यकीन जानो, अगर इसको पढ़नेवाला समझदार होगा, तो इसमें उसको आपत्ति नहीं होगी कि तुमने बस इतना सा ही लिख दिया कि, मैं तो जीवन को समझना चाहता हूँ , मैं इस क्षेत्र को बारीकी से देखना चाहता हूँ ; उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। वह कहेगा- बात बिलकुल ईमानदारी की है और वह कहेगा, बात बिलकुल व्यवहारिक भी है क्योंकि इससे ज़्यादा कोई कर भी क्या सकता है। समझ रहे हो ना? तो बहुत आसान है लक्ष्य लिखना। बहुत-बहुत आसान है। उससे अधिक आसान कुछ हो नहीं सकता।

