प्रश्नकर्ता: क्या मेरा हल्का होना सामने वाले को पता चलेगा?
आचार्य प्रशांत: यही बोझ है।
प्र: सर, मैं इसलिए पूछ रही हूँ…
आचार्य: हम्म हम्म हम्म… मत पूछो! यही बोझ है। सामने वाला ही तो बोझ है न! ये विचार भी कि – “मेरे हलके होने से क्या सामने वाले को पता चलेगा” – इस क्षण तुम्हें ये विचार आ कैसे सकता है?
प्र: क्योंकि सर, अगर उसको मेरा…
आचार्य: अभी भी अगर दूसरे का विचार आ रहा है कि उसे दिखेगा कि नहीं दिखेगा, तो यही तो बोझ है। इस बात को समझो। तुम्हारे सवाल का मैं कोई जवाब नहीं दे सकता, सिर्फ़ यही जवाब दे सकता हूँ कि ये सवाल ही तो बोझ है। तुम्हारे सवाल में ‘दूसरा’, अपने पूरे वज़न के साथ समाया हुआ है – यही तो बोझ है। तुम्हें दिख नहीं रहा है?
तुम्हारा सवाल क्या है? कि मेरे मन पर कोई बैठा हुआ है। कोई भी और उत्तर तुम्हारी मदद नहीं कर सकता, एक ही उत्तर दे सकता हूँ कि इस सवाल को ही मत पूछो। जब तक ये सवाल बाकि है कि – “मेरे हल्का होने से दूसरे पर क्या असर पड़ेगा?” तब तक तुम हुए कहाँ हल्के? तुम काल्पनिक सवाल पूछ रहे हो, हुए नहीं न?


