प्रश्नकर्ता: मैंने जीवन में अभी तक लाभ-हानि देखकर ही निर्णय लिया लेकिन अभी मुझे जीवन में कोई सार नज़र नहीं आता। अब मैं आपके पास बैठकर बस देखना चाहता हूँ। अब मैं अध्यात्म की ओर ही आना चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: अच्छा है। कहीं कोई दुविधा है?
प्र: आपके पास बैठकर सारी दुविधा दूर हो जाएँगी।
आचार्य: बात क्या है पूरी उसको याद रखा करिए।
पूरी बात के छोटे हिस्सों में उलझ गए तो पूरी बात को गँवा देंगे। ये जो छोटा हिस्सा है ये है तो पूरे का ही पर जो छोटे में लिप्त हो गया, छोटे में ही खो गया वो पूरे को गँवा देगा।
पूरी बात क्या है? बहुत सीधी है — जीने के दस-बीस हद-से-हद किसी के तीस-चालीस साल और बचे हैं और ये बहुत ज़्यादा होते नहीं क्योंकि इतने तो आप जी ही चुके हैं न?
जितनी ज़िंदगी आप जी चुके हैं, ये देखा है कैसे पलक झपके बीती है? गौर किया?
अभी तो जवान थे आप बस कुछ ही दिन पहले। अभी स्कूल में थे, कॉलेज में थे और अभी बच्चे थे आप, यूँ ही दौड़-भाग रहे थे मैदान पर गलियों में, अभी-अभी, है न? और अचानक आप पाते हैं कि आप तीस के हैं, चालीस के हैं, पचास के हैं, साठ के हैं। कई युग, कुछ कल्प बीत गए क्या वहाँ तक पहुँचने में जहाँ आप आज पहुँच चुके हैं?



