प्रश्नकर्ता: सर, अपने जीवन में सब कुछ बनाए कैसे रखें? ऐसे कैसे जीयें, कि सब कुछ ठीक रहे?
आचार्य प्रशांत: मान लो कि तुम अपने किसी दोस्त के साथ हो। तुम्हें एक किस्सा सुनाता हूँ, और ये मेरे साथ वाकई हुआ है। मैं अपने किसी दोस्त के साथ था, ठीक है? मिलने आया था मुझसे, बड़े दिनों बाद मिल रहे थे। तो हम हँस रहे हैं, मज़े ले रहे हैं। हँसी-हँसी में उसने कहा, “चलो किचन में चल कर कुछ बनाएँ।” ठीक है? अब दोनों घुसे किचन में, कुछ बना रहे हैं; बनाना दोनों को ही नहीं आता, तो प्रयोग कर रहे हैं। और प्रयोग करते-करते शक्कर गिरा दी, तेल गिरा दिया। कोई चीज़ थी, वो जो बर्नर था उसके ऊपर डाल दी, और बर्नर चोक (जाम) हो गया।
और हम हँस रहे हैं। सब ग़लत हो रहा है जो कर रहे हैं, और हम हँस रहे हैं। और उसके बाद जो मसाला निकल कर आया, जो प्रोडक्ट निकल कर आया, वो इतना ज़बरदस्त, कि पूछो मत। पुलाव में च्यवनप्राश डाल दिया, और हँस रहे हैं। और जितना गड़बड़ होता जा रहा है, उतना ज़्यादा हँस रहे हैं। सब कुछ ग़लत हो रहा है, और हम मस्त हैं। क्यों मस्त हैं? सब ग़लत हो रहा है, फिर भी हम मस्त हैं। क्यों मस्त हैं? जल्दी बोलो।
अरे दोस्त के साथ हैं, इसलिए मस्त हैं। अकेले-अकेले इतनी गड़बड़ हो जाती, तो मुँह उतर जाता। अभी यार साथ में है, बाहर ग़लतियाँ हो भी रही हैं, तो क्या फ़र्क़ पड़ता है? अब बल्कि जितनी ग़लतियाँ होंगी, उतना ज़्यादा मज़ा आएगा। क्यों?
प्र: क्योंकि साथ है।
आचार्य:


