प्रश्न: आचार्य जी, कुछ दिन पहले घर में एक दुर्घटना हुई। घर के बगल की बिल्डिंग में काम चल रहा था। अचानक उसकी एक दीवार मेरे घर की एक दीवार पर गिरी। संयोगवश मेरी पत्नी उस दीवार के पास थीं और उन्हें काफ़ी चोट आई। उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती करवाया और एफ.आई.आर दर्ज कराई।
अभी आपको सुन रहा हूँ तो समझ आ रहा है कि कैसे परिस्तिथियों ने मेरा मन जकड़ लिया था; मैं विरक्त नहीं रह पाया। अभी आपको सुन रहा हूँ तो मन शांत है, पर जब घटना घटती है तो मन विरक्त नहीं रह पाता।
आचार्य प्रशांत: जितना अभी समझ में आएगा, उतना अगली बार विरक्त रहने में मदद मिलेगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि अगली बार इस तरह की कोई घटना घटेगी - चाहे अच्छी, चाहे बुरी, क्योंकि विरक्ति दोनों में चाहिए; अभी जो घटना घटी है वह कष्टप्रद थी, आगे जो घटना घटे हो सकता है वह सुखप्रद हो। पर अनासक्ति तो दोनों में ही चाहिए न? जितना आप इस बात को अभी समझेंगे, उतना अगली बार अनासक्त रहने में मदद मिलेगी। इसका अर्थ लेकिन यह बिल्कुल नहीं है कि अगली बार जब कोई इस तरह की उत्तेजक या मूल्यवान प्रतीत होती हुई घटना घटेगी, तो आप उससे पूरे तरीक़े से विरक्त रह पाएँगे। न! लेकिन ‘विरक्ति’ थोड़ी बढ़ेगी। घटना का आप पर जो प्रभाव हो रहा है, वह थोड़ा कम होगा। घटना आपको जितना झंझोड़ गई, वह कम हो जाएगा।
अभ्यास से आता है।
देखिए, अहम् ने प्रकृति के साथ जुड़े रहने का बड़ा लंबा अभ्यास कर रखा है। एक तरह का रिफ्लेक्स एक्शन हो गया है। 'रिफ्लेक्स एक्शन' जानते हैं न? जिसके लिए आपको विचार भी नहीं करना पड़ता, अपनेआप हो जाता है - जैसे नाक पर मक्खी बैठी और आपने हाथ से हटा दिया। इस तरीक़े से हम वृत्तियों के गुलाम हो गए हैं, क्योंकि हम उनसे बहुत समय से जुड़े रहे हैं। अब हटने का भी अभ्यास करना पड़ता है। समय लगता है; तत्काल नहीं होगा। लेकिन हाँ, समय कम लग सकता है अगर आपका इरादा पक्का हो। लेकिन यह मत समझिएगा कि आप सुनेंगे और काम हो जाएगा। सच तो यह है कि सुनकर भी काम हो सकता है, लेकिन फिर उसके लिए अनंत इरादा चाहिए।


