प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, बचपन से ऐसी शिक्षा दी जाती है कि बहुत पढ़ो, बहुत कमाओ। नौकरी-छोकरी, यही सिखाया जाता है। और फिर अभी जब पैसा कमाते हैं, तब एक परिस्थिति आती है कि सब सुख हैं, लेकिन आनंद नहीं है। तो अब सत्य कहाँ? सत्य की ओर कैसे जाएँ? अभी हम बीच में हैं, तो क्या करें?
आचार्य प्रशांत: बहुत विस्तृत सवाल है, "क्या करें?" यही पहला सवाल है, यही आखिरी सवाल भी है। किसी भी पल में, किसी भी जगह पर, किसी भी इंसान के लिए क्या करना सही है?
एकदम ज़मीनी बात करेंगे। अध्यात्म को ऐसा नहीं बना लेना है कि बहुत दूर की हवा-हवाई बात है; एकदम ज़मीन की बात। कभी भी, किसी के लिए भी सही क्या होता है?
मैंने कहा है कि हम सब शुरू तो कर ही चुके हैं। हम सबकी ज़िंदगी में कितने मुद्दे हैं? एक ही है क्या? कभी कोई भी सूची बनाते हो, तो उसमें एक से आगे नहीं जा पाते क्या? कितने मुद्दे हैं जीवन में? बहुत सारे मुद्दे हैं न?
तो क्या करें? सबसे पहले ये देखना है कि दो तरह के मुद्दे हुए जीवन में, एक वो जो हमारी सूची में मौजूद हैं मुद्दों की तरह और दूसरे वो जो हमारी सूची में मौजूद ही नहीं हैं।
कुछ मुद्दे वो हैं ज़िंदगी में जिनको हम मानते हैं कि ये एक इशू (मुद्दा) है जिसपर विचार चाहिए। कोई चीज़ है जो हमें समस्या की तरह लगती है। कुछ है जो मन में घूमता रहता है। एक तो वो क्षेत्र है।

