आचार्य प्रशांत: तुममें से कई लोग नौकरी ढूँढने निकलोगे, नौकरी ऐसी देखो जहाँ तुम खेल सको। ये न देखो कि महीने के अंत में पैसे कितने मिलेंगे, ये देखो कि, "क्या ये जगह मेरे खेलने का मैदान बन सकती है? मैं मज़े ले सकता हूँ? मैं मुक्त दौड़ सकता हूँ?" अगर मुक्त दौड़ सकते हो, तो ज़रूर उस जगह पर रहो। पर, जो जगह तुम्हें मुक्त दौड़ने नहीं देती, उछलने-कूदने नहीं देती, गिरने नहीं देती, चोट खाने नहीं देती, और किसी दिन मौज है तो चुप-चाप सोने नहीं देती, उस जगह पर कभी न रुकना। जहाँ तुम्हें ये हक न हो कि आज हमारी मौज है, आज हम सिर्फ विश्राम कर रहे हैं। खेलने का हिस्सा है, थम जाना खेलने का हिस्सा है, “अभी हम थमे हुए हैं।” जो जगह तुम्हें ये हक नहीं देती कि तुम गिरे पड़े हो – खेलने में गिरने का हक होता है, चोट खाने का हक होता है, याद रखना ये खिलना, गिरना, उठना, चोट खाना, रुक जाना, ये व्यर्थ नहीं होता, यही गहरी सृजनात्मकता, क्रियेटिविटी है। तुम सृजनात्मक तभी हो सकते हो जब तुम निष्काम कर्म करो। पूरी दुनिया तलाश कर रही है सृजनात्मकता की, और बड़ी गोष्ठियाँ होती हैं, बड़े समारोह होते हैं किसी तरीके से कुछ सृजनात्मक लोग मिल जाएँ, किसी तरह पता चल जाए कि अपने संगठन में हम सृजनात्मकता को प्रोत्साहन कैसे दें? तुम बात समझे ही नहीं, क्योंकि तुम जानते ही नहीं कि सृजनात्मकता क्या है और कहाँ से आती है।
सृजनात्मकता आती है खिलंदड़ेपन से।
सृजनात्मकता फूल है मुक्ति का। जब मन मुक्त होता है, तो उसमें जितने फूल लगते हैं, वो नए-नए, और सुन्दर, और अपूर्व होते हैं। इन अपूर्व फूलों को सृजनात्मकता कहा जाता है। अपूर्व यानि वो जिसका अतीत से कोई लेना देना ना हो। तो हम बात तो बहुत करते हैं, सृजनात्मकता, पर क्या हमें पता है कि सृजनात्मकता कभी ऐसे माहौल में आ नहीं सकती जहाँ परिणामों पर बहुत ज़ोर दिया जाता हो, जहाँ तरक्की पर बहुत जोर दिया जाता हो? तरक्कीपसंद लोग कभी सृजनात्मक नहीं हो सकते। सृजन उनके बस का नहीं है। निर्माण कर सकते हैं वो, पर निर्माण सृजन नहीं है।
समझ रहे हो बात को?


