प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरे जीवन की जो समस्या मुझे समझ आती है, वो ये है कि मेरे अंदर संसार को लेकर भय है। भय जैसे मेरे अंदर जड़ बनाकर बैठ ही गया है। मुझे अजनबी लोगों और परिस्थितियों पर बिना किसी कारण ही संदेह उठता है और डर तो लगातार दिन से रात तक बना ही रहता है। यहाँ शिविर में आने के दौरान, रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के दौरान और शिविर में आने का जब ख्याल उठा था तब से लेकर अभी आने तक भी लगातार डर ही बना हुआ है। इस भय के साथ जीना मेरे लिए अत्यंत कष्टकारी होता जा रहा है। यह डर शारीरिक और मानसिक दोनों हानि को लेकर उत्पन्न होता है। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन दिशाओं से समझना पड़ेगा बात को पूरी। पहली बात है संदेह की। संदेह में अपने-आपमें कोई बुराई नहीं होती। संदेह से तो कहीं ज़्यादा घातक होता है विश्वास। हममें से अधिकांश लोग संदेह के मारे हुए नहीं हैं। हमारे दुःख, समस्याओं और बंधनों का कारण हमारा झूठा, अंधा विश्वास है। संदेह तो हम वास्तव में कर ही नहीं पाते, करते भी हैं तो बहुत कम। संदेह होना चाहिए।
एक कोण से कहूँ तो धार्मिकता संदेह करने की कला है। किस पर संदेह? उस पर संदेह जो दिख रहा है क्योंकि और उपलब्ध ही क्या है संदेह करने के लिए। जो दिख रहा है, प्रतीत हो रहा है, जान पड़ता है उसके अलावा उपलब्ध कौन है संदेह करने के लिए। तो उसी पर तो संदेश करोगे न? और उस पर संदेह क्यों करना है? क्योंकि जो कुछ भी दिख रहा है, प्रतीत हो रहा है, अनुभव में आ रहा है, जान पड़ता है उसको देखने वाले तो हम ही हैं न।
तो दुनिया में जो कुछ भी बहुत विश्वसनीय, या बड़ा सच्चा लगता है; उस पर संदेह करो जिसने उसे विश्वसनीय और सच्चा मान लिया। और कहाँ छुपती है माया? हमारे विश्वास और आत्मविश्वास में ही तो। किसी दूसरे पर यकीन कर लेते हो तो कह देते हो विश्वास और दूसरा जैसा प्रतीत हो रहा है और जिसको प्रतीत हो रहा है उस पर हमारे भरोसे का नाम है आत्मविश्वास। यही माया है: बड़ा भरोसा कर लेना अपने पर और अपने देखे हुए पर।

