वक्ता: पिंजरा कितना भी मज़बूत हो, उसकी तीलियाँ कितनी भी सघन, लेकिन आकाश अपना अहसास करा ही देता है। बिलकुल बंद दीवारों द्वारों वाला पिंजरा हो, तो भी अपना अहसास करा देगा क्यूँकी आकाश पिंजरे के बाहर ही नहीं, पिंजरे के भीतर भी है, और पक्षी के भीतर भी है।
आकाश में और पक्षी में मूलतः कोई भेद नहीं।वो आवाज़ देगा, तुम कितने भी अँधेरे में जी रहे हो, बीच–बीच में तुम्हें जताएगा कि अँधेरा आखिरी बात नहीं है।असल में दुःख तुम्हें हो ही नहीं सकता अगर आनन्द न हो। ऊपर-ऊपर से देखो तो ऐसा लगता है जैसे दुःख. सुख का अभाव है; जैसे कि दुःख, सुख को पाने कि चेष्टा कर रहा है। पर ध्यान से देखोगे तो ये पाओगे कि दुःख, सुख का अभाव नहीं, आनंद का अहसास है।
आनंद न होता, तो तुम दुखी क्यूँ होते?
आनंद तुम्हारा स्वभाव न होता तो तुम्हें अफ़सोस किस बात का होता? तुम दुखी हो और दुःख के अतिरिक्त कोई संभावना ही न रहती, तुम कहते, ‘’ठीक! मैं वैसा ही हूँ, जैसा मैं हो सकता हूँ, और विकल्प क्या है? यही तो मेरी नैसर्गिक अवस्था है और कभी दुःख से कभी ऊबे तो सुख। ठीक है! यही तो खेल है, चल रहा है।’’पर दुःख में तुम टिक पाते नहीं, सुख की आशा रहती हैं; और सुख में तुम टिक पाते नहीं, दुःख की आशंका रहती है। टिक इसलिए नहीं पाते क्यूँकी आसमान है, आनन्द है, वो अपना अहसास कराता रहता है पिंजरे के पक्षी को।असली गुनहगार वही है! उसीने चैन छीन रखा है तुम्हारा, वो न हो तो तुम जहाँ हो जैसे हो संतुष्ट रहोगे। तुम्हारी तड़प का कारण वही झलक है जो बीचबीच में दिख जाती है। तुमने अपने झूठों का पूरा एक किला तैयार कर रखा है और उसके सारे द्वार-दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर रखे है, पूरा अँधेरा कर लिया है और तुमने अपने आपको समझा लिया है कि अँधेरा ही सत्य है।पर ज़रा सा कहीं एक छेद बाकी रह जाता हैं रौशनी की एक किरण उसमें प्रवेश कर जाती है।
वो तुम्हें मुँह चिढ़ाती है।वो तुम्हारा सारा झूठ खोल के रख देती है।तुम उसकी हत्या के लिए दौड़ते हो, इस ज़रा से सुराख से वो आई होती है तुम उस सुराख को बंद करते हो, पर सत्य तो सत्य, आकाश तो आकाश, आनंद तो आनंद, वो तो जो है वो है, वो तो वो है जो अस्तित्वमान है और जो अस्तित्वमान है वो रहेगा।तुम्हारी सारी कोशिशों के बावजूद रहेगा।वो दरवाज़े के नीचे से ज़रा सी जगह पा जाती है अगली बार वो वहाँ से आ जाती है।तुम भीतर ‘तमोत्सव’ मना रहे होते हो, ‘अँधेरे का त्यौहार’, मात्र अँधेरा है, और दरवाज़े के नीचे से, जो बिलकुल अभेद्य कर लेते हो तुम अपनी दीवारों को और दरवाजों को। और आखिरी बार पक्का करने के लिए अपने आप से पूछते हो कि अब तो कहीं से कोई संभावना नहीं, कहीं से कोई रोशनी नहीं, नहीं तो भीतर से, कहीं से कोई आवाज़ आती है कि, ‘अँधेरे को देख पाने को आँखों को रोशनी किसने दी?’

