वक्ता: इम्तिहान में आया है कि दो और दो कितना होता है। तो आप क्या करते हो? आप क्या करते हो? आप चार लिख देते हो, और उसके बाद आप रुक नहीं जाते।
श्रोता १: नेक्स्ट क्वेश्चन (अगला प्रश्न )।
वक्ता: हाँ, नेक्स्ट क्वेश्चन (अगला प्रश्न), और उसके बाद आप जब पर्चा वगैराह लिख कर के आगे आ गए, आप रुक नहीं जाते।
श्रोता १: कन्फर्म (इस बात की पुष्टि) करते हैं।
वक्ता: कन्फर्म (इस बात की पुष्टि) करते हो। ठीक है – “दो और दो चार हैं”। फिर उम्मीद करते हो कि अब नंबर मिल जाएगा। तो आपने जो पूछा दो और दो कितना होता है, तो मैं बताता हूँ – *टू प्लस टू प्लस कन्फर्मेशन प्लस होप इज़ इक्वल टू फोर (२ + २ + इस बात की पुष्टि + आशा = ४)*। सो (इसलिए), टू प्लस टू इज फोर माइनस कन्फर्मेशन माइनस होप *(२ +२ = ४ – इस बात की पुष्टि – आशा)*। कभी ऐसा हुआ है कि दो और दो चार हों बिना उम्मीद के? कभी ऐसा हुआ है? हम मन की बात कर रहे हैं न। मन में मात्र तथ्य तो कभी होते ही नहीं।


