न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत || आचार्य प्रशांत (2015)

आचार्य प्रशांत: बताइए, क्या गा रहे थे?
श्रोतागण: कबीर गा रहे थे।
आचार्य: तो क्या कह रहे थे कबीर?
एक श्रोता: जिनको कुछ नहीं चाहिए, वो शाहों के शाह।
आचार्य: क्या मतलब है इस बात का, “जिन को कुछ नहीं चाहिए, वो शाहन के शाह?” क्या हुआ अभिप्राय इसका? आपने कहा, “अगर हम कुछ नहीं चाहेंगे, तो हम आज़ाद हैं।” तो आज़ादी पहले आएगी या ‘न-चाहना’?
श्रोतागण: न चाहना।
आचार्य: पूर्णता पहले आएगी या वैराग्य पहले आएगा? पेट पहले भरेगा या पहले ये कहोगे कि खाना नहीं चाहिए? तो वो फिर हम पूँछ आगे कर रहे हैं और मुँह पीछे, अगर हम कह रहे हैं कि न चाहने से आदमी बादशाह हो जाता है, तो बात ज़रा उल्टी हो गई है। कबीर ने कहा, ‘जिनको कुछ नहीं चाहिए, वो शाहन के शाह’। इसका अर्थ ये मत लगा लीजिएगा कि न चाह करके आप शाह बन जाएँगे। जो शाह होता है, उसे कुछ नहीं चाहिए। क्यों नहीं चाहिए? इसलिए कि वो सन्यासी है, वैरागी है?
