प्रश्न: आचार्य जी, ‘अपराध बोध’ क्या है?
आचार्य प्रशांत: गहरा अहंकार। मैं, मुझ जैसा, ग़लती कैसे कर बैठा, यह ‘अपराध बोध’ है। इससे फिर निकलता है, पछतावा, ग्लानि, कुंठा। उसके मूल में यही है, मैं गलती कैसे कर बैठा और एक दूसरा मन होता है, जो कहता है, “हम जैसे हैं, हमसे तो ये होना ही था, हम ये न करते तो और क्या करते?” उसे कोई ‘अपराध बोध’ नहीं होता, उसे आदत का बोध होता है कि ये तो मेरी आदत ही है और मैं आदतों के एक पुंज के अलावा और कुछ हूँ नहीं।
श्रोता१: जैसे आम जीवन में भी देखते हैं कि “मैं गाड़ी चला रहा था, अपने दोस्त से बात कर रहा था, सामने एक छोटा-सा पिल्ला आया और क्योंकि मैं रोड की तरफ इतना बखूबी नहीं देख रहा था, तो वो मेरे टायर के नीचे आ गया। अब कष्ट तो होगा, लेकिन वो वापस भी नहीं आ सकता।”
आचार्य जी: ये जिसे कष्ट हो रहा है, क्या ये वही नहीं है जिसने पिल्ले को कुचला?
श्रोता१: वही है।
आचार्य जी: वही है न? तो कष्ट की अनुभूति और पिल्ले को कुचलना भी तो एक ही घटना है न? पिल्ला अभी पूरा कुचला नहीं गया था। ये जो आपको कष्ट हो रहा है, वो उसे कुचलने का हिस्सा है, एक ही घटना है जो आगे बढ़ रही है, क्योंकि आप वही हैं। क्योंकि आप वही हैं तो दो अलग-अलग कर्म तो नहीं कर रहे होंगे। नहीं समझे? मैं कुछ करूँ और उसके बारे में पछताऊँ, तो मैं ये ही कहता हूँ न कि मैंने किया? या ये कहते हैं कि किसी और ने किया? जो पछता रहा होता है, उसका वक्तव्य क्या है? किसने किया था?


