प्रश्नकर्ता: सर, ये जो तीन गुणों का मॉडल है प्रकृति में — तमस, रजस और सत्, तो इसमें एक *हाइरार्की * (अनुक्रम) भी है। तमस, फिर रजस, फिर सत। तो सर, सत् में ऐसा क्या होता है कि वो ज़्यादा करीब होता है साक्षित्व के?
आचार्य प्रशांत: साक्षी हल्का होता है, सतोगुण में भी हल्का होने पर ही प्रधानता है। तीनों गुण प्रकृति के ही हैं लेकिन सतोगुण पर जो चलता है, उसके गुणों के पार निकल जाने की संभावना बढ़ जाती है।
तीनों गुण प्रकृति के ही हैं लेकिन जो तमस में फँसा हुआ है, वो तमस में फँसा रहेगा, जो रजोगुण में फँसा है, वो वहीं फँसा रहेगा। लेकिन जो सतोगुण में है, वो हो सकता है कि गुणातीत निकल जाए।
प्र२: सर, इन गुणों के बारे में थोड़ा-थोड़ा समझा दीजिए।
आचार्य: तीनों में अलग-अलग विषयों से अहम् जुड़ा रहता है। तमस गहरे अज्ञान की तरह है। बिलकुल अँधेरी रात हो जैसे। एक बेहोशी है तमस। रजस ऐसा है, जैसे कि उस काली रात में तुम्हारी नींद खुल गई हो, और तुम बदहवासी में भागना शुरू कर दो कि, “मुझे डर लग रहा है, मुझे डर लग रहा है।” तो एक बदहवास दौड़ है रजस। और सत है रौशनी, ज्ञान।
आलसी मन ‘तमोगुण-प्रधान’ कहा जाता है। आलसी है, ऊर्जा ही नहीं है। जो चल रहा है, उसको चलने देना चाहता है। इसको कहते हैं ‘तमोगुण’। महत्वाकांक्षी मन ‘रजोगुणी’ कहा जाता है। वो भागता है, उसे कुछ चाहिए। और शांत और स्थिर मन ‘सतोगुणी’ कहा जाता है।

