वक्ता: जब आकर्षण नहीं है, परन्तु फिर भी जुड़ाव है, सम्बंधित हैं, तो उसको समझना कि जुड़ाव है। आकर्षण नहीं है, पर जुड़ाव तब भी रह सकता है, आदत के फल स्वरूप। कि जैसे दो शरीर, एक दूसरे के साथ गले मिले हुए थे और तब ही मर गए। अब प्राण नहीं है उनमें, पर तब भी वो सदा मिले हुए ही रहेंगे। और इसीलिए सदा मिले हुए रहेंगे क्यूँकी प्राण नहीं है उनमें। प्राण अगर होते, तो दूर हो जाते। तो आकर्षण नहीं है, पर प्राण भी नहीं है।
अधिकांशतः मामले जो अरेंज मैरिज के होते हैं, वो ऐसे ही होते हैं। आप वहाँ बहुत कम ख़ट-पट पाओगे। पति-पत्नी बिलकुल एक हो चुके होते हैं, और एक चुके होते हैं इसका ये मतलब नहीं हैं कि उनके बीच में कोई डिवाइन कनेक्शन है। उसका यही मतलब है कि दोनों एक दूसरे के बिलकुल आदती हो गए हैं। गंभीर आदत पड़ गई है एक दूसरे को देख़ने की और इस आदत को उन्होनें पारस्परिक प्रेम समझ लिया है। ये प्रेम नहीं है, ये आदत है।
आप तीस-चालीस साल किसी भी चीज़ के साथ रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक छड़ी के साथ रहो, तो आप बिछुड़ नहीं पाओगे। आप एक जानवर के साथ तीस साल रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक मोटर कार तीस साल चलाओ, आपसे वो बेची नहीं जाएगी – ये प्रेम नहीं है। और अक्सर जो पुराने लोग होते हैं, थोड़े उम्र दराज़, वो आज कल के लोगों को यही कहते हैं कि तुम्हारा प्यार क्या है? तुम्हारा प्यार सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण है। ”मुझको देखो, अपनी दादी को देखो, हम में कोई शारीरिक आकर्षण नहीं, फिर भी हम कितने जुड़े हुए हैं।” उनकी बात यहाँ तक तो ठीक थी कि जवान आदमी का जो प्यार है, वो क्या है? शारीरिक आकर्षण। लेकिन वो भूल गए कि अगर जवान आदमी के पास प्रेम नहीं है, तो प्रेम तुम्हारे पास भी नहीं है। वो जुड़ा है शरीर के वशीभूत होकर और तुम जुड़े हो आदत के वशीभूत होकर।
प्रेम दोनों ही किस्सों में नहीं है। तुम्हारी आदत लग चुकी है कि सुबह उठूँगा, बुढ़िया का चेहरा दिखेगा। बुढ़िया की आदत भी लग गई है कि सुबह उठूंगी, इसके लिए चाय बनाउंगी। और कुछ नहीं है।

