रिश्ते में अगर आज़ादी नहीं तो रिश्ता झूठा है || आचार्य प्रशांत (2016)

रिश्ते में अगर आज़ादी नहीं तो रिश्ता झूठा है|
आचार्य प्रशांत: मालिक मने क्या?
श्रोता : अधिकार जमाने वाला।
वक्ता: अधिकारी?
श्रोता: सर, हमारा जो अहंकार वो हमें एक भ्रम दे देता है की हम मालिक हैं|
वक्ता: सत्य से सम्बंधित एक बहुत मूलभूत बात, पर ज़रा गौर करेंगे। आध्यात्मिकता में, जो कुछ भी केंद्रीय है उसका कोई अर्थ नहीं होता। कम से कम, उसका कोई विधायक अर्थ नहीं होता; ऐफिरमेटिव, पॉजिटिव अर्थ नहीं होता। प्रत्येक शब्द, आध्यात्मिकता में अर्थ-हीन है। तो आप कहेंगे, “जब अर्थ-हीन है, तो उसका प्रयोग ही क्यों किया जाता है? जिसका कोई अर्थ नहीं उसकी उपयोगिता क्या?” उसकी उपयोगिता मात्र इतनी होती है कि वो अपने विपरीत का नकार करता है।
