प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्यार क्यों नहीं है रिश्तों में आजकल?
आचार्य प्रशांत: किसके?
प्र: सबके।
आचार्य: नहीं, सबके रिश्तों में नहीं है ऐसा हमें कैसे पता? हमें तो उन्हीं के रिश्तों का पता होगा न जिनसे हम रिश्ते में हैं?
प्र: जिनसे हम जुड़े हुए हैं।
आचार्य: बस। तो अगर हम कह रहे हैं कि रिश्तों में प्यार नहीं है, तो हम कह रहे हैं, “हमारे रिश्तेदारों के रिश्तों में प्यार नहीं है।” क्योंकि हमें खबर ही बस उनकी है जो हमसे रिश्ते में हैं। तो हम कह रहे हैं, “हमारे रिश्तेदारों के रिश्ते में प्यार क्यों नहीं है?” तुम बताओ तुम्हारे रिश्तेदार ऐसे क्यों हैं? ये तो तुम्हें बताना होगा न? ये तुम्हें कैसे पता कि ‘कहीं’ प्यार नहीं है? ‘दुनिया में प्यार क्यों नहीं है’ ये जानना हो तो ये देख लो कि हममें प्यार क्यों नहीं है। हममें प्यार क्यों नहीं है, बताओ?
प्यार का मतलब होता है सरलता, प्यार का मतलब होता है चाहिए तो चाहिए; जैसे बच्चे का चित्त, ये प्यार कहलाता है। उसे जो चाहिए तो फिर चाहिए; ये प्यार है। और हम हैं बड़े होशियार लोग, होशियार आदमी व्यापार तो कर सकता है; प्यार नहीं कर सकता। बच्चा कहेगा “चाहिए तो चाहिए।” और तुम कहोगे “चाहिए!” कोई आ कर कहेगा “इधर आ, उससे बेहतर कुछ है मेरे पास।” तो तुम कहोगे “अच्छा, दिखा भाई तेरे पास क्या है?” इसलिए प्यार नहीं है।

