सारे धर्मों के त्याग के बाद क्या? || आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण और श्री अष्टावक्र पर (2016)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा श्रुचः ||
अनुवाद: सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा। तुम शोक मत करो।
~भगवद् गीता (अध्याय १८, श्लोक ६६)
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृष्ण कहते हैं “सर्वधर्मान्परित्यज्य मोमकं शरणं व्रजः” मतलब कि सब धर्म छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। अष्टावक्र कहते हैं कि सभी धर्म और बंधन त्याग दो, उसके बाद क्या करना होगा, वो कभी नहीं कहते हैं। कृपया, यह स्पष्ट कीजिए।
आचार्य प्रशांत: कृष्ण कौन हैं? कृष्ण क्या कोई नया धर्म है? कृष्ण जब अर्जुन से कह रहे हैं — ‘सर्व धर्मम्परितज्य’। तो यहाँ तक तो ठीक है। यह बात तो अर्जुन के दायरे की है कि "अर्जुन तू है और तेरे द्वारा पालित सारे धर्म हैं। तू है, तेरे धर्म हैं।’’ और कहा कि “तू अपने पाले सारे धर्मों को छोड़ दे।” यहाँ तक तो बात अर्जुन की थी। इसके आगे की बात कृष्ण की है।
इसके आगे की बात क्या है? ‘मामेकं शरणं व्रजः’, "मैं जो एक हूँ, मेरी शरण में आ।" अब बात अर्जुन की तो नहीं है, तो यानी कि अर्जुन की भाषा में तो नहीं की जा सकती। अब बात अर्जुन के मन से आगे की है। अर्जुन के व्याकरण और इस संसार से आगे की है।





