प्रश्नकर्ता: जीवन में पहले लिए हुए कुछ निर्णयों के बारे में सोचकर अक्सर पछतावा रहता है। इन पछतावों की भावनाओं में फँसा रहता हूँ और कुछ भी नया करने में झिझक होती है। पछतावे से बाहर कैसे आएँ?
आचार्य प्रशांत: देखो पछताने में अपने-आप में कोई बुराई नहीं हो गई लेकिन अगर तुम समझो ही नहीं कि अतीत में जो हुआ वह क्या हुआ, कैसे हुआ और उसे करने वाला कौन था, और बस तुम इस बात का दुःख मनाते रहो कि परिणाम अच्छा नहीं आया तो उससे तुम्हें कोई लाभ नहीं होने वाला।
यह दो चीज़ें होती हैं — अतीत में जो कुछ भी हुआ था, एक तो है उसकी पूरी प्रक्रिया। वह हुआ कैसे, किसके साथ हुआ, कैसे हुआ, उस काम को करने का निर्णय लेने वाला कौन था — ये पूरी प्रक्रिया।
और दूसरी छोटी सी चीज़ होती है कि जो कुछ हुआ उसका परिणाम। ज़्यादातर लोगों को जो पछतावा होता है वह प्रक्रिया को लेकर के नहीं, परिणाम को लेकर के होता है। तुम बताओ तुम्हें कौन सा पछतावा है? प्रक्रिया को लेकर पछतावा है कि जो हुआ वह कैसे-कैसे हुआ? क्योंकि जो कुछ भी तुमने किया, वह एक झटके में नहीं कर दिया। जो कुछ भी किया उसकी तैयारी बहुत समय से चल रही होगी। मन एक तरह का आकार ले रहा होता है, मन एक तरह की संगति ले रहा होता है, मन एक तरह की धारणा बना रहा होता है। और फिर एक दिन तुम कोई घटना कर देते हो, फिर उस घटना का परिणाम आ जाता है।
ज़्यादातर हमें जो दुख होता है, वह घटना का नहीं होता है, परिणाम का होता है क्योंकि परिणाम हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं आया था। हम जो चाहते थे वह हुआ नहीं, चोट लग गई, असफलता झेलनी पड़ी कुछ नुकसान हो गया — हमें इस बात का पछतावा रहता है। कर्म का पछतावा नहीं रहता।
कर्ता बिगड़ा हुआ था—कर्ता माने जिसने कर्म किया—कर्म गड़बड़ हुआ और कर्म के पीछे जो कर्ता बिगड़ा हुआ था, इन बातों का हमें नहीं पछतावा रहता। हमें पछतावा यह रहता है कि जो कर्म किए उसका नतीजा अच्छा नहीं मिला, चोट लग गई।

