सहायता की प्रतीक्षा व्यर्थ है || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

प्रश्नकर्ता: मैं अपने डर को कैसे तोड़ सकता हूँ? जब तक मुझे बाहरी सहायता न मिले, मैं कैसे अपने ही द्वारा बनाए गए खेलों से, अपनी सीमाओं से बाहर आऊँ?
आचार्य प्रशांत: जीवन किसी बाहरी सहायता की प्रतीक्षा करने का नाम नहीं है। जीवन किसी ख़ास मसीहा के स्वागत के लिए खड़े रहने का नाम नहीं है। कोई मदद नहीं आने वाली बाहर से, सारा इंतज़ार व्यर्थ है।
अपनी मदद तुम्हें खुद ही करनी पड़ेगी।
ये जो डर है, ये जो सीमाएँ हैं, इन्हें तुम्हें स्वयं ही समझना पड़ेगा। हाँ, जिस दिन तुम स्वयं समझने को तैयार हो जाओगे, उस दिन पाओगे कि सारा अस्तित्व तुम्हारी सहायता करने के लिए तत्पर है। विपरीत मत समझ लेना। ये मत समझ लेना कि मदद पहले आती है और उस मदद से मुक्ति जन्मती है। इसका विपरीत होता है।
मन को जब मुक्ति दिखाई देती है, तो वो पाता है कि चारों तरफ़ से मदद आ ही रही है। और ये पक्का जानो कि मदद करने के लिए पता नहीं कितने लोग, कितनी स्थितियाँ तैयार बैठी हैं। दिक्क़त मदद के अभाव की नहीं है, दिक्क़त है कि तुम अभी तैयार नहीं हो। दिक्क़त ये है कि तुम अभी जान नहीं पा रहे कि ये सीमाएँ तुमने ख़ुद बनाईं हैं, कि अपने डर के कारण तुम खुद हो, कि अपने-आपको बाँधने वाले तुम ख़ुद हो।
जिस दिन सोच लोगे कि उड़ना है, उस दिन पाओगे कि सब कुछ उड़ने में ही मदद कर रहा है। कोई एक सहायक नहीं है, जीवन में सब कुछ तुम्हारी सहायता करने के लिए उत्सुक ही है, एक-एक परिस्थिति, एक-एक काम, एक-एक क्षण।


