श्रोता: सम्बन्धों को कैसे बनाए रखें?
वक्ता: पहले यह समझना पड़ेगा ‘सम्बन्ध’ माने क्या ? यह शब्द जब हमारे दिमाग में आता है तो इसके दो अर्थ हो सकते हैं। ध्यान से समझिएगा:
एक अर्थ तो यह है कि कुछ शब्द हैं जिनको हम सम्बन्ध मान लें। दोस्त, माँ, बाप, पति, पत्नी, बहन, भाई। हम कहते हैं इसका अर्थ है सम्बंधित होना। यह सम्बन्ध हैं। जीवन में यही तो सम्बन्ध होते हैं। मालिक-नौकर, शिक्षक-छात्र। यही तो सम्बन्ध होते हैं। तो इन शब्दों को हम सम्बन्ध मान लें और मुझे ऐसा लग रहा है कि रोहित जब कह रहे हैं कि “सम्बन्धों को कैसे बनाए रखें?” तो ‘बनाए रखें’ से मतलब ही यही है कि इस तरह के जो सम्बन्ध हैं उनको कैसे वैसा ही रखा जाए जैसा उनको होना चाहिए। होना चाहिए का क्या अर्थ है? कि हमे पहले ही पता है कि अगर माँ है और बेटा है तो उनमें ‘इस’ प्रकार का सम्बन्ध होना चाहिए। थोड़ा बहुत दाएं-बाएं हो सकता है पर अगर ज्यादा विचलन हो तो हमें स्वीकार नहीं होगा। अगर दो दोस्त हैं तो उनमें ‘ऐसा’ ही सम्बन्ध होना चाहिए। और जैसा पहले से ही निर्धारित है कि ‘ऐसा’ सम्बन्ध दो दोस्तों के बीच में होता है, उस से हटकर अगर कोई सम्बन्ध बन रहा है तो हमको बड़ी अजीब बात लगेगी। हम स्वीकार नहीं कर पाएंगे।
सम्बन्धों के देखने का एक तरीका तो यह है कि सम्बन्धों का अर्थ है, दो लोगों के बीच में बंधा-बंधाया रिश्ता। दो लोगों का जो आचरण होता है वह इस-इस प्रकार से हो, उसके कुछ नियम, यह है सम्बन्ध। और शायद रोहित ऐसे ही सम्बन्धों की बात कर रहे हैं।
सम्बन्ध एक दूसरे प्रकार के भी होते हैं।थोड़ा उसको देखेंगे। वह दूसरा प्रकार होता है कि अभी जब तुम यहाँ बैठे हुए हो और तुम्हारे हाथ में एक कॉपी है और एक पैन है तो तुम उस से सम्बंधित हो। निश्चित रूप से सम्बंधित हो! तुम यहाँ पर बैठे हो, मेरे साथ हो, मेरी बातें सुन रहे हो, तुम मुझसे सम्बंधित हो। मैं तुमसे बात कर रहा हूँ तो मैं तुमसे सम्बंधित हूँ। और ज़रूरी नहीं है के यह जो सम्बंधित है यह पहले से ही परिभाषित हो।



