वक्ता: देखिये, ये अदब है ज़िन्दगी जीने का। हम बच्चों को ना अपने, बड़े ही सतही एटिकेट सिखाते हैं। जीवन भी एक सम्मान माँगता है। हमको वो सम्मान देना नहीं आता, हमें सतही अदब तो आता है। कुछ मैनर्स ,एटिकेट हम जान गए पर उसके आगे की बात हम नहीं जानते हैं। बहुत सतही है। बहुत, बहुत ही सतही है और वो नकली है। एक असली एटिकेट भी होता है। आप कैसे जानोगे कि कब किसकी आँखों में आँख डाल के देखना है, और कब नहीं देखना? कैसे जानोगे? कौन सी मर्यादा आपको ये सिखा सकती है? और इसका बड़ा एटिकेट है, कि आंख कब झुकनी है और कब उठनी है। एक कमरा है, उसमें साँस भी कब लेनी है, उसका भी एक एटिकेट है क्यूंकि साँस लोगे तो हवा भी कंपित होती है। और वो गहरी संवेदनशीलता से ही निकलती है बात, अन्यथा, ये कोई किताब नहीं सिखा पाएगी। ये बिलकुल नहीं जान पाओगे।
श्रोता: सर, संवेदनशीलता एक्सैक्ट्ली क्या होती है?
वक्ता: संवेदनशीलता होती है कि जो कुछ भी है, मैं उसको अनुभव कर रहा हूँ। आप कब कहते हो कि, ‘’मेरा कोई अंग अब संवेदनाहीन हो गया?’’ जब आप उस पर कुछ रख भी दो, तो भी कुछ पता न चले। है ना? उसको चिकोटी भी काटो, तो पता न चले। तो जो हो रहा है, वो उसको रजिस्टर नहीं कर पा रहा जो है । वो उसको रजिस्टर नहीं कर पा रहा, तो इसको आप क्या बोलते हो संवेदनहीनता है ना? तो संवेदनशीलता क्या हुई? कि हल्की से हल्की चीज़ भी जो हो रही है, आप उसके प्रति सजक हो।
श्रोता: लेकिन, हमारा मन तो फ़िल्टर कर देता है बहुत चीज़ें?
वक्ता:

