प्रश्न: सर, कोई अगर मर गया, तो वो भी तो स्थिर हो गया?
वक्ता: जिसको ऐसी ज़िन्दगी बोलते हो, उसकी तो स्थिरता यही है। मुर्दा बहुत स्थिर होता है। वैसे तो हर समय जीवन भर हिलता-डुलता ही रहा, कब्र में डाल दो, फिर स्थिर हो जाता है। लेकिन दिक्कत ये है कि वहां भी रह नहीं पाता। कई बार भूचाल आते हैं और कब्रों में से मुर्दे उखड़-उखड़ कर बाहर आकर पड़ते हैं। जिसको तुम ज़िन्दगी बोलते हो उसमें तो कुछ भी स्थिर नहीं है, लगातार सब हिल रहा है। जो स्थिर लगता भी है वो भी स्थिर नहीं है। जैसे मुझे अभी तुम स्थिर लग सकते हो, पर सच ये है कि मैं और तुम, दोनों, हजारों किलोमीटर की गति से आग बढ़ रहे हैं।
तो यह जो जीवन है, इसमें तो कहीं स्थिरता नहीं है, हो ही नहीं सकती। स्थिरता अपने उस बिंदु पर हो सकती है जो सब अस्थिरताओं को आता-जाता देख रहा है। जैसे समझ लो कि ज़बरदस्त तूफ़ान चल रहा है, उसमें सब हिल रहा है। तुम उस तूफ़ान में पांव जमाके खड़े हो और तुम उसको देख रहे हो, तो क्या स्थिर है? जो सामने पेड़ हिल रहा है वो स्थिर है क्या? जो हवा चल रही है वो स्थिर है क्या? तुमने जो कपड़े पहन रखें हैं वो स्थिर हैं?
श्रोता १: नहीं सर।
वक्ता: तुम्हारा शरीर भी स्थिर है क्या? बाल उड़ रहे हैं, हो सकता है कि झोंका इतनी तेज़ आए कि तुम भी हिल जाओ। शरीर भी स्थिर है क्या?
पर फिर भी कुछ है, जो स्थिर है, वो क्या है?

