स्वाभिमान में 'स्व' कहाँ? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)

वक्ता: वो जो छोटा आदमी है, जो उसको अपना आत्म-सम्मान बोल रहा है। तो वो आत्म-सम्मान कहाँ से आ रहा है? वो समाज के वातावरण से आ रहा है जिसमें बड़े लोगों को प्राथमिकता दी जाती है, ठीक? तो क्या ये वास्तव में उसका आत्म-सम्मान है या ये उसके भीतर किसी और ने भरा है? बताओ मुझे।
हर लड़की गोरी दिखना चाहती है क्योंकि लड़के गोरी लडकियों को प्राथमिकता देते हैं। अब इसमें कोई आत्म-सम्मान है क्या? ये तो लड़कों का सम्मान है न जो लड़कियों ने अपने भीतर भर लिया है, सही या नहीं?
जिसको आप अपना आत्म-सम्मान बोल रहे हो, वो वास्तव में एक मूल्यांकन है जो किसी ने आपके बारे में बनाया है। आपके आत्म-सम्मान की जड़ में एक मूल्य व्यवस्था है जो आपको बताती है कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या मूल्यवान है। क्या होगा जब आपकी मूल्य व्यवस्था ही बाहरी समाज से आई हो? उदहारण के तौर पर – अगर सामाजिक मूल्य प्रणाली ये है कि जो लोग बहुत पैसा कमाते हैं, सिर्फ़ उनको महत्वपूर्ण समझो, सिर्फ़ वही मूल्यवान हैं। तो इसका मतलब ये हुआ कि अगर आप ज्यादा नहीं कमा रहे हैं तो आप में आत्म-सम्मान नहीं है क्योंकि आपको समाज ने यही सिखाया है कि उसी का मूल्य है जिसके पास पैसा है, सही है न? बात समझ रहे हो? नहीं समझ में आ रही? आप जिन बातों को कहते हो कि जिनसे मेरा आत्म-सम्मान निर्धारित हो रहा है, वो बातें भी तो बाहर से ही आ रही हैं।
आत्म-सम्मान और सम्मान में ज़्यादा फ़र्क नहीं है। बल्कि बिलकुल भी फ़र्क नहीं है। स्वार्थापरता एक बात है। पर आत्म-सम्मान, ये स्वाभिमान जिसको आप बोलते हो, ये सब बकवास है। स्वार्थापरता ठीक है। मेरे पास एक चेतना है जो मुझे बहुत प्यारी है। ये ठीक है, पर आत्म-सम्मान नहीं। आत्म-सम्मान सिर्फ़ एक मूल्यांकन है जो किसी और के मूल्य व्यवस्था से आता है।
और क्या-क्या नहीं होता सम्मानिता के नाम पे। क्या आपने देखा है कि इस झूठे सम्मान के नाम पे आपसे क्या-क्या करवाया जाता है और आपको क्या-क्या नहीं करने दिया जाता? बहुत सारे काम ऐसे हैं कि जो आपने कर दिए तो आप सम्मानित नहीं रह गए। भले ही वो काम करने से आप दावा करो कि मुझे संतुष्टि मिल रही है, पर सम्मानित होने वाली बेड़ियाँ हमेशा आपके पैरों को जकड़े रहेंगी, सही है न?


