संस्था से संपर्क हेतु इस फॉर्म को भरें: http://acharyaprashant.org/enquiry?formid=201 या कॉल करें: +91- 9650585100/9643750710 ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत संग ऑनलाइन पाठ्यक्रमों में भाग लेने के लिए: https://solutions.acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत से मुलाकात हेतु, और उनकी जीवनी, कृतित्व, पुस्तकों, व मीडिया के लिए: https://acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ इस अभियान को, और लोगों तक पहुँचाने में आर्थिक सहयोग दें: http://acharyaprashant.org/donate ~~~~~~~~~~~~~ वीडियो जानकारी: विश्रांति शिविर, 04.04.2020, ग्रेटर नॉएडा, उत्तर प्रदेश, भारत प्रसंग: गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् । यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्नन् शिखाः सधूमा भजति ह्यन्यदा स्वम् । पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम् ।। भावार्थ: विषयासक्त मन जीव को संसार- संकट में डाल देता है, विषयहीन होने पर वही उसे शांतिमय मोक्षपद प्राप्त करा देता है । जिस प्रकार घी से भीगी हुई बत्ती को खाने वाले दीपक से तो धुएँ वाली शिखा निकलती रहती है और जब घी समाप्त हो जाता है, तब वह अपने कारण अग्नितत्व में लीन हो जाता है । उसी प्रकार विषयों और कर्मों से आसक्त हुआ मन तरह-तरह की वृत्तियों का आश्रय लिये रहता है और इनसे मुक्त होने पर वह अपने तत्व में लीन हो जाता है । ~ परमहंस गीता (अध्याय २, श्लोक ८) ~ क्या ऐसा हो सकता है कि विषयों में आसक्ति हो ही ना? ~ मन विषयहीन कैसे बने? ~ मन का घी कैसे खत्म होगा? बिना तपे व धुआ किये क्या इस अग्नि को शांत किया जा सकता है? ~ विषयहीन होने का तरीका क्या है? ~ मोक्ष की प्राप्ति कैसे हो? संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~~~~~~~~~