संस्था से संपर्क हेतु इस फॉर्म को भरें: http://acharyaprashant.org/enquiry?formid=201 या कॉल करें: +91- 9650585100/9643750710 ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत संग ऑनलाइन पाठ्यक्रमों में भाग लेने के लिए: https://solutions.acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत से मुलाकात हेतु, और उनकी जीवनी, कृतित्व, पुस्तकों, व मीडिया के लिए: https://acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत से मुलाकात हेतु, और उनकी जीवनी, कृतित्व, पुस्तकों, व मीडिया के लिए: https://acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ इस अभियान को, और लोगों तक पहुँचाने में आर्थिक सहयोग दें: http://acharyaprashant.org/donate ~~~~~~~~~~~~~ वीडियो जानकारी: पार से उपहार शिविर, 15.02.20, ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत प्रसंग: पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः स गुणदोषभाक् । कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ।। भावार्थ: जिस पुरुष का मन अशांत है, असंयत है, उसी को पागल की तरह अनेको वस्तुएँ मालुम पड़ती हैं; वास्तव में यह सब चित्त का भ्रम ही है । नानात्व का भ्रम हो जाने पर ही ‘यह गुण है’‘यह दोष है’ इस प्रकार की कल्पना करनी पड़ती है । जिसकी बुद्धि में गुण और दोष का भेद बैठ गया है, जो दृढ़मूल हो गया है उसी के लिए कर्म, अकर्म और विकर्म के भेद का प्रतिपादन हुआ है । ~अवधूत गीता (अध्याय १, श्लोक ८) ~ " बुद्धि में नानात्व का भ्रम हो जाता है " इसका क्या अर्थ है? ~ नानात्व दूर कैसे हो? ~ मन की अशांति दूर कैसे हो? ~ ज्ञान को जीवन में कैसे उतारें? ~ नानात्व को पचेड़ा क्यों कहते हैं? ~ कर्मों को गौर से देखने पर इतना ज़ोर क्यों है? ~ कर्म- अकर्म, विकर्म या निष्काम है, यह जानने पर क्यों इतना ज़ोर है? ~ कर्ता परेशान क्यों है? संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~~~~~~~~~