🧔🏻♂️ आचार्य प्रशांत गीता पढ़ा रहे हैं। घर बैठे लाइव सत्रों से जुड़ें, अभी फॉर्म भरें — https://acharyaprashant.org/hi/enquiry-gita?cmId=m00021 📚 आचार्य प्रशांत की पुस्तकें पढ़ना चाहते हैं? फ्री डिलीवरी पाएँ: https://acharyaprashant.org/hi/books?cmId=m00021 📲 आचार्य प्रशांत की मोबाइल ऐप डाउनलोड करें: Android: https://play.google.com/store/apps/details?id=org.acharyaprashant.apbooks iOS: https://apps.apple.com/in/app/acharya-prashant/id1603611866 📝 चुनिंदा बोध लेख पढ़ें, खास आपके लिए: https://acharyaprashant.org/en/articles?l=1&cmId=m00021 ➖➖➖➖➖➖ #acharyaprashant #ashtavakra #motivation #improvement #inspiration #vedanta वीडियो जानकारी: 06.07.24, वेदान्त संहिता, ग्रेटर नॉएडा इन चक्करों में हम फँसते नहीं || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2024) 📋 Video Chapters: 0:00 - Intro 0:53 - प्रकृति और संयोग का खेल 11:58 - संयोग और नियति का अंतर 20:56 - ऋषि अष्टावक्र का सूत्र 23:51 - बुलबुले और जीवन की लीला 28:32 - देह भाव और भ्रम से मुक्ति 32:02 - सत्य का दर्शन और अगंभीरता 42:19 - अनायास और निरायास - ग्रंथों का आशीर्वाद 47:00 - ताज़गी और मन की शांति 51:13 - श्रम और देह का अवलोकन 56:36 - ग़ुलामी से आज़ादी 1:04:02 - जीवन का नर्क 1:06:37 - समापन विवरण : इस वीडियो में आचार्य प्रशांत जीवन, दुख, और संयोग के विषय में गहन विचार करते हैं। वे बताते हैं कि हम अक्सर बाहरी परिस्थितियों और संयोगों के गुलाम बन जाते हैं, और यह हमारे जीवन के अनुभवों को निर्धारित करता है। आचार्य जी का कहना है कि हम अपनी पहचान को बाहरी चीजों से जोड़ते हैं, जैसे कि किसी विशेष घटना या व्यक्ति के प्रति हमारी प्रतिक्रिया। वे यह भी बताते हैं कि जीवन में जो कुछ भी होता है, वह संयोग का परिणाम होता है, और हमें अपनी इच्छाओं और कामनाओं को समझने की आवश्यकता है। आचार्य जी ने यह स्पष्ट किया कि वास्तविकता में, दुख और सुख दोनों ही हमारे अपने हाथ में नहीं होते। हमें अपने भीतर की शक्ति को पहचानना चाहिए और बाहरी संयोगों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। आचार्य जी ने यह भी कहा कि हमें अपने जीवन को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, बल्कि इसे एक खेल की तरह देखना चाहिए। वे यह सुझाव देते हैं कि हमें अपने कार्यों को निष्काम भाव से करना चाहिए, बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा के। प्रसंग: ~ दुख से मुक्ति कैसे मिले? ~ बेबाक, बिंदास कौन खेलता है? ~ कामना कब दबाव बनाती है? ~ क्यों अनुभव झूठी चीज़ है? और ज्ञान सच्ची? ~ सुख, दुख की समस्या का झूठा समाधान क्यों है? ~ दुख की समस्या का सच्चा समाधान क्या है? ~~~~~~~~~~~ अष्टावक्र गीता: श्लोक 11.4 सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते अन्वय: सुखदु:खे = सुख और दुख; जन्ममृत्यू = जन्म और मरण; दैवात् एव = दैव से ही होता है; इति = ऐसा; निश्चयी = निश्चय करने वाला; साध्यादर्शो = साध्य कर्म को न देखने वाला; जेडच = और; निरायासः = श्रम-रहित; कुर्वन् = कर्म को करता हुआ; न लिप्यते = नहीं लिप्त होता है। भावार्थ: सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु दैव से ही होते हैं, जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी दृष्टि में साध्य कुछ नहीं रहता। उसे परिश्रम नहीं होता और कर्म करने पर भी वह लिप्त नहीं होता। दैव : प्रकृतिगत संयोग जिन्हें लोक संस्कृति में ईश्वरीय आदेश या देव आज्ञा भी मान लिया जाता है। शारीरिक श्रम : स्थूल वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाई जाती हैं। या फिर उनका रूप-रंग, आकार आदि परिवर्तित किया जाता है। शारीरिक श्रम भौतिक परिवर्तन से संबंध रखता है। संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~