संस्था से संपर्क हेतु इस फॉर्म को भरें: http://acharyaprashant.org/enquiry?formid=201 या कॉल करें: +91- 9650585100/9643750710 आप अपने प्रश्न इस नम्बर पर व्हाट्सएप्प कर सकते हैं: +91-7428348555 ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत संग ऑनलाइन पाठ्यक्रमों में भाग लेने के लिए: https://solutions.acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ आचार्य प्रशांत से मुलाकात हेतु, और उनकी जीवनी, कृतित्व, पुस्तकों, व मीडिया के लिए: https://acharyaprashant.org ~~~~~~~~~~~~~ इस अभियान को, और लोगों तक पहुँचाने में आर्थिक सहयोग दें: http://acharyaprashant.org/donate ~~~~~~~~~~~~~ वीडियो जानकारी: शब्दयोग सत्संग, 17.4.17, अद्वैत बोधस्थल, नॉएडा, भारत प्रसंग: ~संत कौन है? ~सच्चा संत कैसे पहचाने? ~संसारी कौन हैं? ~संत और संसारी में भेद है? ~झूठे संत का क्या पहचान है? ~क्या संत का आचरण संसारी से अलग होता है? ~संत कहने का क्या आशय हैं? ~संत से हमारा क्या नाता है/क्या सम्बन्ध है? ~कैसे जाने की हम संत के करीब है या दूर है? ~हम संत कैसे बन सकते है? ~संत और संसारी के प्रेम में क्या अंतर है? ~संसारी के लिए प्रेम क्या है? ~संत प्रेम किसे कहते है? संगीत: मिलिंद दाते ~~~~~~~~~~~~~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८ से धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत् । नो समाधिं न विक्षेपं न लोपं स्वस्य पश्यति ॥१८॥ तत्वज्ञ पुरुष तो संसारियों से उल्टा ही होता है, वो सामान्य लोगों जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरुप में न समाधि देखता है, न विक्षेप और न लेप ही।