
आज से १ लाख वर्ष पीछे जाओ तो अरबों-खरबों जानवर थे, हज़ारों-लाखों प्रजातियों के; और मनुष्य थे कुछ लाख, अधिक-से-अधिक। अब आदमी हो गए हैं ८ अरब और जानवर बचे हैं (हाथों से कम मात्रा दर्शाते हुए) इतने से!
साहब!
जानवर भी कौन से बचे हैं बताइए? जो मनुष्य के…

जहाँ माँस खाना शुरू किया, तहाँ समझ लो कि आप कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाने वालों की कतार में शामिल हो गए। उपभोग के माध्यमों में जो चीज़ ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक उष्मीकरण) के लिए सबसे ज़्यादा घातक है वो है माँस का सेवन। माँस का सेवन समझ रहे हैं सबसे ज़्यादा घातक…

पृथ्वी पर नहीं है इतने संसाधन कि तुम बच्चे पैदा करे ही जा रहे हो, करे ही जा रहे हो। और मैं जो बोलूँगा वो बात बहुत चुभेगी, बता देता हूँ!
इस समय पृथ्वी पर बच्चा पैदा होने से ज़्यादा अशुभ काम दूसरा नहीं है। मातम का काम है अगर…

प्रश्नकर्ता: पशुओं का परिवार नियोजन कैसे करें, और क्या नियोजन करना सही है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति इस बात से बिलकुल सरोकार नहीं रखती कि तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता क्या है। उसको सरोकार बस इस बात से होता है कि जीव कितने हैं। जीवन की गुणवत्ता क्या है, इससे प्रकृति को…

प्रश्न: आचार्य जी, वर्तमान जीवन के व्यवहारिक कष्टों पर प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें हैं, और बड़ी सीधी-सीधी हैं।
पहली बात तो ये कि - बच्चे मत पैदा करो। अगर ये उम्मीद कर रहे हो कि दुनिया में आठ-सौ करोड़ लोग हैं आज - जो कि




हम कहते हैं कि अब कुछ नया करते हैं, फ़ूड योगा , मूड योगा * । कोई ऐसा शब्द नहीं है जो अब * योगा के साथ नहीं जोड़ दिया गया है। नई-नई क्रियाएँ निकल रही हैं, नई-नई प्रक्रियाएँ निकल रही हैं। ये मुद्रा, ये आसान, ये करते हैं, वो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम लोग कुछ भी करने बैठें, जैसे पढ़ने बैठें, योग करें, मैडिटेशन करें, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियन्त्रित…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या

मुक्तिका उपनिषद् है, उसमें राम ही कह रहे हैं, ‘एक उपनिषद् को कोई पढ़ ले वो तर जाएगा।‘ अच्छा एक में काम नहीं होता तो चलो जो १० या ११ प्रमुख उपनिषद् हैं उनको पढ़ लो! अच्छा उनसे भी काम नहीं होता तो लो मैं सूची दिए देता हूँ १०८…

कोई तुम्हें तुम्हारी ग़लती दिखाए और बुरा अगर तुम्हें लगता है, तो तुम जवान कभी-भी होने से रहे। जिसे जवान होना होता है वो अपनी ग़लतियों का सामना करता है। बहुत होते हैं मोटी खाल के बेशर्म टट्टू, उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। उन्हें दिख रहा होगा कि ज़िंदगी…

अकेले रह जाना कहीं अच्छा है साँप-बिच्छुओं के साथ रह जाने से, है न? भूखे रह जाना कहीं अच्छा है ज़हर पी जाने से। प्रतीक्षा कर लो, इंतज़ार कर लो, प्रतीक्षा में भी परमात्मा होता है। जब तुम कहते हो, ‘कोई मिला नहीं ऐसा जो तेरी तरफ़ ला सके इसलिए…

य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशतः ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एताद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥
जो एक मायापति अपनी प्रभुतासंपन्न शक्तियों द्वारा संपूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।…

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेति वेद्यं न च तस्यारित वेता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥
वह पुरम पुरुष हाथ-पैरों से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता और कानों से रहित होकर भी सब सुनता है। वह जानने वाली चीज़ों को जानता…

प्रश्नकर्ता: हमने अभी समझा, आचार्य जी, कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है। तो अब जो इंसान बाहर भी ढूँढ रहा है, बुलडोज़र चला रहा है, खरगोश मार रहा है, तो मेरे ख्याल से निराशा का भी सही आयाम ज़रूरी है क्योंकि इंसान वहाँ भी निराशा तो पा ही रहा है।…

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखमा्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
वह परमपुरुष सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है।

नवद्वारे पूरे देही हँसो लेलायते बहि:। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥
वह परम-पुरुष प्रकाश के रूप में नवद्वार वाले देह रूपी नगर में अंतर्यामी होकर स्थित है। वही इस बाह्य-स्थूल जगत में लीला कर रहा है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत में आपने एक बात कही थी कि हम सब की जो शुरुआत है वो एक बिंदु मात्र से हुई है और वैसा ही कुछ वैज्ञानिक भी कहते हैं कि शुरुआत बिग-बैंग से हुई थी। तो क्या अध्यात्म में जो आंतरिक जगत की बात है और ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वह अपूर्ण क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है, चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। सत्य ही जब…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए यानि सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानि कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो सत्य जैसा प्रतीत होता है?
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
तो…
आचार्य प्रशांत: जो मूल औपनिषदिक सिद्धान्त है इस श्लोक के…
आचार्य प्रशांत: नवद्वार तो समझते ही…

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमॉंल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥
वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,…

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
मैं इस अविद्यारूप तमस से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरुप परमात्मा को जानता हूँ, उसे जानकर ही विद्वान मृत्यु के चक्र को पार कर सकता है, अमरत्व प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद्…

ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथा निकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति॥
जो उस जीवजगत से परे हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, जो अत्यंत व्यापक है, किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत को अपनी सत्ता से घेरे…

पुरुष एवेदँ सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥
जो भूतकाल में हो चुका है, जो भविष्यकाल में होने वाला है और जो अन्नादि पदार्थों से पोषित हो रहा है, यह सम्पूर्ण परम पुरुष ही है और वही अमृतत्व का स्वामी है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १५)
आचार्य…

सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
वह परमात्मा सहस्त्र सिर वाला, सहस्त्र नेत्रों वाला और सहस्त्र पैरों वाला है। वह सम्पूर्ण जगत को सब ओर से घेर कर भी दस अंगुल बाहर (सम्पूर्ण रूप से) स्थित है अथवा नाभि से दस अंगुल ऊपर हृदयाकाश में स्थित है।
~…

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥
पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता, हे रुद्रदेव! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें।
यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसी: पुरुषं जगत्॥
हे हिमालयवासी सुखदाता!…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। क्या चेतना और सत्य भिन्न हैं? ये विवेक क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है सत्य। तो हम जैसे हैं, जीव की जो स्थिति होती है, उसमें चेतना और सत्य बिलकुल भी एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।
सत्य…

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहता्॥
वह परम पुरुष समस्त इंद्रियों से रहित होने पर भी उनके (इंद्रियों के) विषय-गुणों को जानने वाला है। सबका स्वामी-नियंता और सबका बृहद् आश्रय है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १७)
आचार्य प्रशांत: वह परम पुरुष, वह शुद्ध-मुक्त चेतना इंद्रियों द्वारा लाए…

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः।।
वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वही इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय…

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः॥
वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वहीं इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय…

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥
वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,…

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वह अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३,…

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति।।
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३,…

आचार्य प्रशांत: ब्रह्म को किन-किन उपाधियों से इंगित किया गया है, विभूषित किया गया है, कहो जैसे? अनिकेत। अनिकेत कह दिया वहीं से शुरुआत कर लो। तो तुम्हारे सामने दो विकल्प आ रहे हैं, एक विकल्प ऐसा है जो तुमको इस धरती पर ही किसी पार्थिव वस्तु से, व्यक्ति से…

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोअस्ति कष्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरूषेण सर्वम्॥
जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल जो आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण…

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदनं पूणं पुरुषेण सर्वं॥
जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण विश्व संव्याप्त है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय…

प्रश्नकर्ता: क्या जीवन को उसकी उच्चतम संभावना में जीना ही ब्रह्म को पाना है? जीवन के पार भी कुछ है?
आचार्य प्रशांत: जीवन के पार कुछ भी नहीं है। ठीक है? बिलकुल इस भ्रांति से बाज आ जाइए कि अध्यात्म जीवन के पार या मृत्यु के पार इत्यादि किसी अन्य…

प्रश्नकर्ता: माया की गति, आपने कहा, इतनी तेज़ है जैसे मक्खन में छुरी। हम समझ भी नहीं पाते और सब कुछ घट जाता है। तो फिर हम माया की गति कैसे कम करें ताकि हमको चुनाव का समय मिल जाए?
आचार्य प्रशांत: अच्छा हुआ मैंने कह दिया कि सवाल भेजिए…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: ये नया है। (हँसते हुए) प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों होती है? प्रकृति ने ऐसा क्या किया, भाई? तुम प्रकृति ही हो। तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से…

यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः।।
जब योग साधना से युक्त साधक दीपक के सदृश आत्मतत्व के द्वारा ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार करता है, तब वह अजन्मा, निश्चल, सम्पूर्ण तत्वों से पवित्र उस परमात्मा को जानकर सम्पूर्ण विकार रूप बंधनों से मुक्ति पा लेता…

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् । तद्वाऽऽत्मतत्तवं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः॥
जिस प्रकार मिट्टी से मलिन हुआ रत्न या आभूषण शोधित होकर प्रकाशमय हो कर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्व का साक्षात्कार कर के शोकादि से मुक्त होता है और अद्वितीय तथा कृतकृत्य हो…

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्दस्मान्नाणीयो न ज्यायोस्ति कश्चित। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥
जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त…

यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश। य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः।।
जो परमात्मा अग्नि में है, जो जल में है, जो समस्त लोकों में संव्याप्त है, जो औषधियों तथा वनस्पतियों में है, उस परमात्मा के लिए नमस्कार है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय २, श्लोक १७)
आचार्य प्रशांत:…

लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं खरसौष्ठवं च। गंधः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगवृत्तिं प्रथमा वदंति॥
शरीर की स्थूलता कम होना, निरोग होना, विषयों में आसक्ति न होना, शरीर में कांति-तेजस्विता होना, स्वर की मधुरता, शुभ गंध का होना, मल-मूत्र अल्प होना, ये सब योग की पहली सिद्धि है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक १३)…

पृथ्व्याप्य तेजोऽनिलस्वे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरं॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — इन पाँचों महाभूतों का सम्यक उत्थान होने पर इनसे सम्बंधित पाँच योग विषयक गुणों की सिद्धि होने पर जिस साधक को योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो जाता है,…

नीहारधूमार्कानलानिलानां खद्योतविद्युतस्फटिकशशिनाम्। एतानिरूपाणिपुरःसराणि ब्रह्माण्यभिव्यक्तिक राणि योगे॥
योग साधना प्रारम्भ करने पर ब्रह्म की अभिव्यक्ति स्वरुप सर्वप्रथम कुहरा, धुआँ, सूर्य, वायु, जुगनू, विद्युत्, स्फटिकमणि, चन्द्रमा आदि बहुत से रूप साधक के समक्ष प्रकट होते हैं।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय २, श्लोक ११)
आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से कैसे पढ़ें इसको?…

समेशुचौशर्करा वह्वीवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोनुकूले न तु चक्षुपीडनेगुहा निवाताश्रयणेप्रयोजयेत्त॥
साधक को चाहिए कि वह समतल और पवित्र भूमि, कंकड़, अग्नि तथा बालू से रहित, जल के आश्रय और शब्द आदि की दृष्टि से मन के अनुकूल, नेत्रों को पीड़ा ना देने वाले (तीक्ष्ण आतप से रहित), गुहा आदि आश्रय स्थल में…

प्राणान्प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः श्रीणे प्राणे नासिकयोच्छवसीता। दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धास्येताप्रमत्तः॥
विद्वान् पुरूष को चाहिए कि आहार-विहार की सभी क्रियाओं को विधिवत् सम्पन्न करते हुए प्राणायाम की क्रिया करके जब प्राण क्षीण हो तो उसे नासिका से बाहर निकाल दे। जिस प्रकार सारथी दुष्ट अश्वों से युक्त रथ को अत्यन्त सावधानी…