
अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपका हमारे लिए क्या संदेश है?
आचार्य प्रशांत: (प्रेमपूर्वक हँसते हुए) मुझे ही ले चलो, मैं ही संदेश हूँ!
मज़ाक नहीं, मैं ही संदेश हूँ भाई! क्या संदेश दूँगा! जो भी संदेश दूँगा शाब्दिक होगा, तो अधूरा होगा। जैसे जी रहा हूँ देख लो, वही संदेश है।

प्रश्नकर्ता: सादर प्रणाम, मेरा प्रश्न ये है कि सब कुछ जानने के बावजूद भी हम अंजान क्यों बने रहते हैं या यूँ कहें कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमे अंजान बने रहने के लिए बाध्य करती है? ऐसा क्यों होता है आचार्य जी, मुझे समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: सब कुछ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा कैसे दें? अभी जैसे अध्यात्म बेस (आधार) पर चल रहा है कि बुनियाद होनी चाहिए। अब मेरा बुनियाद तो नहीं है अध्यात्म और बच्चे पैदा हो गए ऐसे ही। तो उनका भी बेस (बुनियाद) नहीं हो पाएगा। जब मैं ही कोई बात नहीं…

प्रश्नकर्ता: आज आपको सामने देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। इस ख़ुशी के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। जैसे अर्जुन को साक्षात ईश्वर के दर्शन हुए थे वैसे मुझे भी लग रहा है। मैं आपके सामने झोली फैलाकर आई हूँ। मैं वह पाना चाहती हूँ जो आपके अंदर…

आचार्य प्रशांत: ''टोसुई का सिरका'' अब कहानी ज़रा ध्यान से सुनो।
टोसुई एक ज़ेन गुरु थे, जिन्होंने आश्रम के पारम्परिक ढंग के जीवन को त्याग दिया था और एक पुल के नीचे भिखारियों के साथ जीवन यापन शुरू कर दिया था। जब वे बूढ़े हो रहे थे तो उनके एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी के चरणों में कोटि–कोटि नमन। गुरुजी, मैं एक अध्यापक हूँ और बच्चों को शिक्षित करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। अक्सर मेरे समक्ष कुछ ऐसे शिष्य भी आ जाते हैं जो आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर होते हैं, तो उनसे बिना कोई फ़ीस इत्यादि लिए मैं उन्हें…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जब गुरु के साथ होता हूँ तो सामान्यतः कोई सवाल नहीं होते हैं और विचार सुनने की स्थिति रहती है। लेकिन जैसे ही अलग होता हूँ तो दिमाग में कई सवाल आते-जाते रहते हैं। तो गुरु की उपस्तिथि या अनुपस्तिथि में एक ऐसी स्थिति कैसे बन…

आचार्य प्रशांत: प्रश्न है, "क्या वेदादि शास्त्रों के स्वाध्याय उपरांत उन पर आचरण करने के बाद भी किसी गुरु की, जीवन की उन्नति या मोक्ष की प्राप्ति हेतु आवश्यकता है?"
शास्त्र यूँ ही नहीं पढ़े जाते, शास्त्र पहले पात्रता माँगते हैं और पात्रता परीक्षा होती है। शास्त्र कहते हैं, "दिखाओ,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जैसे एक साधक होता है, तो वो शिक्षक कब जा कर बन जाता है?
मैं फेसबुक, इंस्टाग्राम और दूसरी जगहों पर भी देखता रहता हूँ। जैसे ओशो संन्यास ही है; तो एक समय के बाद वो ज्ञान बाँटना शुरू कर देते हैं। तो ज्ञान किसे देना…

आचार्य प्रशांत: 'कूटस्थ' और 'अन्तर्यामी' क्या है? ध्यान दीजिएगा। 'कूटस्थ' शब्द जितना सुन्दर है, जितना विभूतियुक्त है, उतना ही रहस्यमयी भी है। 'कूट' शब्द ही एक-दूसरे से जुड़े हुए कई अर्थ रखता है। कूट का एक अर्थ होता है - 'आधारभूत', 'प्रतिष्ठा' -- वो जिसके ऊपर सबकुछ प्रतिष्ठित या आधारित…

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितं।
असारं निन्दितं हेयमि ति निश्चित्य शाम्यति॥९- ३॥
अनुवाद: यह सब अनित्य है, तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है, सारहीन है, निंदनीय है, त्याग करने योग्य है, ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है।

धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत्।
नो समाधिं न विक्षेपं न लोपं स्वस्य पश्यति॥१८- १८॥
अनुवाद: तत्त्वज्ञ पुरुष तो संसारियों से उल्टा ही होता है, वह सामान्य लोगों जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरुप में न समाधि देखता है, न विक्षेप और न लेप ही।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या हममें क्षमता नहीं है जीवन को समझने की? क्या गुरु का होना ज़रुरी है?
आचार्य प्रशांत: ये नहीं कहना चाहिए कि हममें क्षमता नहीं है तो हमें गुरु का सहारा लेना चाहिए। इसको ऐसे कहते हैं कि हमारी ही जो क्षमता है वो हमारे सामने गुरु…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अध्यात्म में भाषा का क्या महत्व है?
आचार्य प्रशांत: भाषा बड़े चमत्कार कर सकती है। जो शब्द तुम बोलते हो, वो तुम बोलते ही भर नहीं हो, सुनते भी हो। अपना ही कहा तुम सुनते भी हो। जैसे जानवर होते हैं न, जुगाली करते हैं। जुगाली का…

प्रश्नकर्ता: मेरे काम में दान-दक्षिणा दोनों प्राप्त होते हैं, और मेरी जानकारी में 'दान' अलग विषय है और 'दक्षिणा' अलग विषय है। दक्षिणा मतलब हुआ कि आपने जो सेवा कर्म किया, और दान जो आपको मिलता है। दान की महिमा तो बहुत सुनी है परंतु दान के विषय में कुछ…

प्रश्नकर्ता: मुझे आपके गुरु के बारे में जानना था। आपने एक वीडियो में बताया था कि आपके टीचर एक मुर्गे हुआ करते थे। उनका नाम 'जीतू' था। तो उन्हीं के बारे में जानना था।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है कि जैसे लोग किसी को अपना गुरु मानते हैं, उसी…

प्रश्न: आचार्य जी, मुझे अपने बारे में बताना कि मैं कैसा हूँ। मुझे बहुत भय लगता है, खासकर के महापुरुषों, जैसे आपके सामने।
आचार्य प्रशांत: (हँसते हैं) महापुरुष किसको बोला? दोबारा मत बोलिएगा! (हँसते हुए) गाली दे रहे हैं?

प्रश्नकर्ता: ऊँचा जीवन कैसे जीएँ? आदर्शों को अपने जीवन में कैसे अपनाएँ?
आचार्य प्रशांत: जिसको भी तुम मानते हो अपने से ऊँचा, जिसको भी सम्माननीय मानते हो, उसकी छवि लगातार आँखों में बसी रहे। और आँखें ऐसी हैं नहीं कि जब तक वो भौतिक रूप से न देखें तब तक…

इदमिदमिति तृष्णयाऽभिभूतं जनमनवाप्तधनं विषीदमानम् ।
निपुणमनुनिशाम्य तत्त्वबुद्ध्या व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ।।
जो ये मिले, वो मिले—इस तरह तृष्णा से दबे रहते हैं और धन न मिलने के कारण निरंतर विषाद करते हैं, ऐसे लोगों की दशा अच्छी तरह देख कर तात्विक बुद्धि से संपन्न हुआ मैं पवित्र भाव से इस आजगर-व्रत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपकी सभी बातें पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पाता। मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम फँस इसीलिए जाते हो क्योंकि तुम्हें तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब ऊँचे काम ख़राब होते हैं, कि, "ऊँचा काम हो रहा था और मैं किसी निचले केंद्र में ही…

प्रश्नकर्ता: गुरु की पहचान क्या है?
आचार्य प्रशांत: गुरु की पहचान ही क्या है?
जो मुक्ति दिला दे, सो गुरु।

प्रश्न: कभी-कभी हमें ये लगता है कि हमारे साथ गुरु हैं, मतलब हम गुरु के साथ हैं, तो हम कुछ भी कर सकते हैं।
(श्रोतागण हँसते हैं)
मन निडर हो जाता है और वो कभी-कभी ग़लत दिशा में जाने लगता है। लगता है कि हाँ ग़लत है, लेकिन फिर भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारत अध्यात्म की राजधानी है और वहाँ इतने सारे आध्यात्मिक गुरु हैं। फिर भी भारत में इतनी परेशानियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें हैं। पहली बात तो अध्यात्म संख्या का खेल नहीं है कि सौ या पाँच-सौ गुरु हो गए तो ज़्यादा संतोषजनक स्थिति हो जाएगी।…

प्रश्न: आचार्य जी, आप आई.आई.टी., आई.आई.एम. के बाद अध्यात्म की शरण में क्यों गये?
आचार्य प्रशांत जी: हर आदमी की अपनी एक यात्रा होती है और उस यात्रा में दस कारण होते हैं जो उसके पीछे लगे होते हैं।

प्रश्न: आचार्य जी, ज़्यादातर संतजन लम्बे बाल और दाढ़ी क्यों रखते हैं?
आचार्य प्रशांत जी: रखते नहीं हैं, लम्बे बाल और दाढ़ी तो होते ही हैं। कभी शेर से पूछा है, बब्बर शेर से, “तेरे मुँह पर इतने लम्बे-लम्बे बाल क्यों हैं?” पूछा है? रखते नहीं हैं – होते हैं।…

प्रश्नकर्ता: गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है? यदि अंतर है, तो सद्गुरु की क्या पहचान है?
आचार्य प्रशांत: कोई अंतर नहीं है।
ये वैसा ही है जैसे कोई पूछे, “सत्य और परम सत्य में क्या अंतर है?” कि कोई पूछे, "आत्मा और परमात्मा में क्या अंतर है?" कि कोई

प्रश्न: आचार्य जी, क्या सपनों में गुरुदर्शन का महत्त्व है?
आजकल कई बार ऐसा हो रहा है कि मेरे गुरुजी सपनों में आ रहे हैं। उनके द्वारा कही गयी बात सुनाई तो देती है, महसूस भी होती है, पर मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि वो कहना क्या…

चकमक पत्थर रहे एक संगा, नहीं उठे चिंगारी।
बिनु दया संयोग गुरु बिनु, होत नहीं उजियारी।।
~ संत कबीर साहिब

आचार्य प्रशांत: गुरु की अनुकम्पा, या स्रोत का, या किसी का भी, कोई कर्म नहीं है। कुछ बातें समझ लो, इस बात को साफ़ साफ़। अनुकम्पा में, कोई चुनाव ही नहीं है। अनुग्रह, कृपा, अनुकम्पा, जो भी उसको बोलो। उसमें कोई चुनाव ही नहीं है कि तुम मनाओ कि…

गुरु धोबी शिष कापड़ा, साबुन सिरजनहार|
सुरति शिला पर धोइये, निकसे ज्योति अपार||
– संत कबीर

प्रश्न:मुझे मेरा लग रहा है कि मेरा कर्म जो है, वो सहजता से आ रहा है पर असल में हो रहा है मेरे अहंकार द्वारा ही। तो क्या मेरा ये पूछना भी उसी अहंकार से है?
वक्ता:अहंकार भी तुरंत ही जवाब देती है। पंखा भी तुरंत ही चलता…

गुरु नारायन रूप है, गुरु ज्ञान को घाट। सतगुरु बचन प्रताप सों, मन के मिटे उचाट।। ~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: सर, हम छात्रों को जवाब देते हैं, तो मौका मिल रहा है, आप जैसा बनने का। मन में बड़ी हलचल सी मची है इस बात को लेकर, कुछ कहें।
आचार्य…

राम तजूं पर गुरू ना विसारुं।
गुरू के सम हरि को ना निहारूं॥
~ सहजोबाई

गुरु ने पठाया चेला नियामत लाना||टेक||
पहली नियामत आटा लाना, ग्राम नगर के पास न जाना|
कुता पिसा छाड़ीयाँ के चेला, झोली भर के लाना||१||

प्रश्न: मैं क्या पूछूँ समझ में नहीं आ रहा है पता नहीं क्यूँ।
वक्ता: दसवीं कक्षा की गणित की चल रही हो क्लास और उसमें बढ़िया पढ़ाया जा रहा है टॉपिक, क्वाड्रैटिक इक़ुएशन मान लो। वहाँ बिठा दो पाँचवी के बच्चे को, जिसको अभी लीनियर इक़ुएशन ही नहीं पता, तो…

प्रश्न: सर, एक प्रश्न है निजी जीवन से, जैसे की यहाँ पर होते हैं तो यहाँ पर कुछ भी पूछने में परेशानी नहीं लगती। पर जैसे मैं अभी कहीं यात्रा पर गया था, तो वहाँ जो प्रेरणास्रोत थे, उनसे कुछ भी पूछने में अजीब लगता था। डर लगता था। पर…

प्रश्नकर्ता: सर, हमसे कहा जाता है कि पहले मन साफ़ करो फिर गीता या कुरान के पास जाओ। पर यह प्रक्रिया तो अध्ययन के दौरान भी हो सकता है न?
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो जो प्रक्रिया है वो जीवन की है। जीवन किसी भी कबीर से या गीता से या…

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो मिलाय।।
~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: गुरु और गोविंद में क्या फ़र्क कहा गया है और उससे क्या अभिप्राय है? क्या यह कहा जा रहा है कि गुरु और गोविंद दोनों हैं, तो पहले गुरु के चरण स्पर्श किए

कहता हूँ कहि जात हूँ, देता हूँ हेला। गुरु की करनी गुरु जाने, चेले की चेला।। ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: दो तरह की करनी हैं। मूल पर जाइए। तीन शब्द हैं इसमें जो महत्वपूर्ण हैं: करनी, गुरु और चेला। करनी, गुरु और चेला, मतलब करनी दो अलग-अलग जगहों से…

प्रश्न: मन का जो ढाँचा है, मन उसे फिर-फिर दोहराता है। ये सब कुछ एक अचेतन बहाव की तरह चलता जाता है प्रतिदिन, क्या करें?
वक्ता: करना क्या है? जो होना है वो हो ही रहा है।

आचार्य प्रशांत: ये पूर्णत: पूर्वनिर्दिष्ट है कि आपको गुरु मिलेगा पर इस प्रारब्ध को आप मानते कहाँ हो! आपको तो जब मिल रहा होता है तो आप छोड़-छोड़ कर भागते हो। प्रारब्ध का अर्थ होता है, नियति का अर्थ होता है, वो जो टल नहीं सकता, वो जो होकर रहेगा;…

प्रश्न: सर, ये ‘प्रबुद्ध मर्मदर्शी’ क्या होता है?
वक्ता: ‘प्रबुद्ध मर्मदर्शी’ वो होता है जिसके बारे में पढ़ के आप आकर्षित हो जाएँ और यहाँ आ जाएँ।
उसके बिना आप आते कहाँ हो। (व्यंग करते हुए )

वक्ता: बिना प्रेम के कुछ सीख नहीं पाओगे। जिनसे सीख रहे हो, उनसे लेन-देन का, दुकानदार और ग्राहक का रिश्ता नहीं हो सकता। ये जितनी मूर्तियाँ यहाँ उपस्थित हैं, इनको अगर देखते ही तुम्हारा मन बिल्कुल हर्षा नहीं जाता, तो उनसे कुछ पाने की सम्भावना मत सोचना।

साधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान।
कहै कबीर कछु भेंट धरूँ, अपने बित्त अनुमान।।
~ कबीर

माया दीपक नर पतंग, भृमि-भृमि मांहि परंत।
कोई एक गुरु ज्ञान ते, उबरे साधु संत।।
~ कबीर

आचार्य प्रशांत: जो अपने मन को जान जाता है, वो जो यह पूरा विस्तृत मन है, इसको भी जान जाता है। इतना तो हम समझते ही हैं, कई बार बात कर चुके हैं कि एक विशाल तंत्र है, और उस विशाल तंत्र में सब कुछ एक दूसरे से जुड़ा हुआ…

प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होय।कबहुक जो अवगुण पड़ै, गुन ही लहै समोय॥
~ संत कबीर
प्रश्न: ‘आप समाना’ कैसे होए?

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय। अब के बिछड़े न मिले, दूर पड़ेंगे जाय॥ ~ कबीर
वक्ता: आमतौर पर एक-दो शब्द होते हैं जो केन्द्रीय होते हैं, उनको पकड़ लीजिये, तो पूरी साखी उसके आसपास ही होती है। इसका जो केन्द्रीय हिस्सा है, वह नीचे की आधी साखी है,…

प्रश्नकर्ता: मैं जीवन में जो भी कर रहा हूँ उस के विरुद्ध जब तर्क आते हैं तो और उन तर्कों को काटने के लिए मेरे पास तर्क नहीं होते, तो ख़ुद पर संदेह होता है। जीवन में संदेह कैसे कम करें?
आचार्य प्रशांत: जितने भी आपको तर्क दिए जाते हैं…
श्रोता: आग जलाने के काम आता है।
आचार्य प्रशांत: ठीक है!
चकमक पत्थर रहे एक संगा।
अकेला है वो। वो कह…
वक्ता: इसलिए दिया गया है क्योंकि राम तुम्हारे लिए बस नाम है। हाँ? राम तुम्हारे लिए बस नाम है। गुरु तो फिर भी…
नदी नाला बचाय के चेला, तुम्बा भर के लाना||२||
तीसरी नियामत कालिया लाना, जीव…
वक्ता: (दोहा पढ़ते हुए) “साधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान। कहै कबीर कछु भेंट धरूँ, अपने बित्त अनुमान।” आपके सामने साधु आता है, आप ‘दे’ पायेंगे? ‘दे’ पाते हैं क्या?…
पतंगे को भ्रम क्या हो गया है? भ्रम क्या है?
श्रोता १: भ्रम…