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Upanishads

लिखनी है नई कहानी?
In Media
लिखनी है नई कहानी?
7min
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हर युवक या युवती के जीवन में एक पड़ाव आता ह है जब उसे ये निर्णय लेना होता है कि वे आम साधारण जिंदगी जीना चाहता है या अपनी कहानी खुद लिखना चाहता है। ऐसे में डर, लालच, संशय अक्सर हमारे मन को घेर लेते हैं और सही निर्णय ले…

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Saint Kabir
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Every Caste Debate Misses the Real Question
In Media
Every Caste Debate Misses the Real Question
6min
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The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.

राजनीति में अध्यात्म क्यों ज़रूरी?
Beliefs
राजनीति में अध्यात्म क्यों ज़रूरी?
1min
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अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15

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Leadership
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What does love mean?
You must know what is love. How it shapes your life.
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Why do I restless
Hindi article on restlessness by AP
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जीवन-मरण का ये चक्र चल क्यों रहा है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)
जन्म-मरण का चक्र क्यों है? इसका अर्थ यही नहीं है कि शिष्य बस इतना ही पूछना चाहता है कि कोई जन्मता क्यों है, कोई मरता क्यों है, चक्र क्यों चल रहा है। वो वास्तव में सबकुछ पूछ रहा है, सबकुछ। अब ये पढ़ने वाले की बुद्धि पर है कि वो इस बात को समझ जाए कि इतना ही नहीं पूछा गया है कि जन्म-मरण का चक्र क्यों है।
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कर्म और अतीत से मुक्ति कैसे मिले ?
इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।
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Description enwcoiew fkwsc J. Krishnamurti.
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शिव-शक्ति
नवरात्र का माहौल है। शक्ति के बारे में कुछ बातें करना प्रासंगिक रहेगा। शिव केंद्र हैं, शिव सत्य हैं। शिव वो हैं जिन तक मन, 'मन' रह कर नहीं पहुंच सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। शक्ति, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है।
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“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।
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स्मोक टेस्ट हिन्दी लेख 16 अगस्त 2026
हिन्दी स्मोक टेस्ट लेख का संक्षिप्त विवरण।
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Who controls your mood?
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लोकमत न्यूज़ – "स्वतंत्रता दिवस: वास्तविक स्वतंत्रता क्या है
\"स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि एक उपलब्धि है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अर्जित करना पड़ता है। राजनीतिक स्वतंत्रता हमें विरासत में मिल सकती है, किंतु मानसिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए सतत प्रयास
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रक्षा बंधन पर आचार्य प्रशांत का संदेश
\"रक्षाबंधन एक स्मरण हो सकता है कि हम सब मिलकर उस विवेक, उस करुणा की रक्षा करें जो जीवन को जीवन बनाती है। यह पर्व केवल उपहारों का आदान-प्रदान न रह जाए, बल्कि यह एक ऐसा संकल्प बन जाए जिसमें हम एक-दूसरे के आत्मबल और ऊंची चेतना के
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राधा-कृष्ण में भी तो प्रेम था, तो आप हमारे प्रेम को सम्मान क्यों नहीं देते?
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
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Why do I restless
This article is related to restlessness.
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गुरु के प्रति धन्यवाद कम क्यों हो जाता है? आचार्य प्रशांत (2017)
अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।
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आंसू अगर सच्चे हैं तो भीतर आनंद ही आनंद है
अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है। आँसुओं के अर्थ ये नहीं है कि तुम दुखी हो, आँसुओं का अर्थ भी हो सकता है कि तुम आनंदित हो। मुक्त अनुभव कर रहे हो, भीतर की जकड़ को छोड़ने के लिए।
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मौत से मुँह छुपाने वाले || आचार्य प्रशांत (2019)
Media Articles
मौत से मुँह छुपाने वाले || आचार्य प्रशांत (2019)
5min
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प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…

संत वो जो तुम्हें विशुद्ध तुम ही बना दे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Chhandogya Upanishad
संत वो जो तुम्हें विशुद्ध तुम ही बना दे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
6min
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पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~कबीर साहब

प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…

इन्द्रियों पर विजय कैसे प्राप्त करें? कर्म और अकर्म क्या?
Truth
इन्द्रियों पर विजय कैसे प्राप्त करें? कर्म और अकर्म क्या?
16min
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श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…

Pradip Test Hindi
Dreams
Pradip Test Hindi
1min
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सही जिज्ञासा क्या? सही माँग कैसी?  || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
श्रीमद्भगवद्गीता
सही जिज्ञासा क्या? सही माँग कैसी? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
15min
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या इज़ ऑब्जेक्टिव नॉलेज एंड विद्या इज़ अविद्या विद सेल्फ नॉलेज (अविद्या भौतिक ज्ञान है और विद्या भौतिक ज्ञान के साथ-साथ आत्म-ज्ञान है)।

तो…

सफलता की असली कुंजी || नीम लड्डू
Adhyatma Upanishad
सफलता की असली कुंजी || नीम लड्डू
1min
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मुक्तिका उपनिषद् है, उसमें राम ही कह रहे हैं, ‘एक उपनिषद् को कोई पढ़ ले वो तर जाएगा।‘ अच्छा एक में काम नहीं होता तो चलो जो १० या ११ प्रमुख उपनिषद् हैं उनको पढ़ लो! अच्छा उनसे भी काम नहीं होता तो लो मैं सूची दिए देता हूँ १०८…

हमारी असली पहचान क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
हमारी असली पहचान क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
40min
34reads

य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशतः ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एताद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥

जो एक मायापति अपनी प्रभुतासंपन्न शक्तियों द्वारा संपूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।…

देह - हमारी साथी या बंधन? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
देह - हमारी साथी या बंधन? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
39min
57reads

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेति वेद्यं न च तस्यारित वेता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥

वह पुरम पुरुष हाथ-पैरों से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता और कानों से रहित होकर भी सब सुनता है। वह जानने वाली चीज़ों को जानता…

उपनिषद् क्यों अनिवार्य हैं? || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
Adhyatma Upanishad
उपनिषद् क्यों अनिवार्य हैं? || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
14min
13reads

प्रश्नकर्ता: हमने अभी समझा, आचार्य जी, कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है। तो अब जो इंसान बाहर भी ढूँढ रहा है, बुलडोज़र चला रहा है, खरगोश मार रहा है, तो मेरे ख्याल से निराशा का भी सही आयाम ज़रूरी है क्योंकि इंसान वहाँ भी निराशा तो पा ही रहा है।…

बाहर सत्य के दर्शन होना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
बाहर सत्य के दर्शन होना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
20min
52reads

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखमा्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥

वह परमपुरुष सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय ३, श्लोक १६)

आचार्य प्रशांत: जो मूल औपनिषदिक सिद्धान्त है इस श्लोक के…

मन की बेचैनी - सत्य का प्रमाण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
मन की बेचैनी - सत्य का प्रमाण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
16min
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नवद्वारे पूरे देही हँसो लेलायते बहि:। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥

वह परम-पुरुष प्रकाश के रूप में नवद्वार वाले देह रूपी नगर में अंतर्यामी होकर स्थित है। वही इस बाह्य-स्थूल जगत में लीला कर रहा है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १८)

आचार्य प्रशांत: नवद्वार तो समझते ही…

मुक्ति - एक अनोखी मृत्यु! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
मुक्ति - एक अनोखी मृत्यु! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
18min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत में आपने एक बात कही थी कि हम सब की जो शुरुआत है वो एक बिंदु मात्र से हुई है और वैसा ही कुछ वैज्ञानिक भी कहते हैं कि शुरुआत बिग-बैंग से हुई थी। तो क्या अध्यात्म में जो आंतरिक जगत की बात है और ये…

सभी परम के रूप हैं || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
सभी परम के रूप हैं || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13min
11reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वह अपूर्ण क्यों होती है?

आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है, चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। सत्य ही जब…

सुख मन को क्यों भाता है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
सुख मन को क्यों भाता है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
14min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए यानि सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानि कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो सत्य जैसा प्रतीत होता है?

आचार्य प्रशांत: दुःख का अभाव।…

पहले हाँ नहीं, ना बोला जाता है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
पहले हाँ नहीं, ना बोला जाता है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
20min
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एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमॉंल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥

वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,…

कभी कुछ समझ से चाहो तो! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
कभी कुछ समझ से चाहो तो! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
19min
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वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥

मैं इस अविद्यारूप तमस से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरुप परमात्मा को जानता हूँ, उसे जानकर ही विद्वान मृत्यु के चक्र को पार कर सकता है, अमरत्व प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद्…

घट-घट में बसा है वो || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
घट-घट में बसा है वो || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
23min
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ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथा निकायं सर्वभूतेषु गूढम्‌। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति॥

जो उस जीवजगत से परे हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, जो अत्यंत व्यापक है, किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत को अपनी सत्ता से घेरे…

संवेदनशीलता ही प्रेम है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
संवेदनशीलता ही प्रेम है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13min
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पुरुष एवेदँ सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥

जो भूतकाल में हो चुका है, जो भविष्यकाल में होने वाला है और जो अन्नादि पदार्थों से पोषित हो रहा है, यह सम्पूर्ण परम पुरुष ही है और वही अमृतत्व का स्वामी है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १५)

आचार्य…

बाहर भी वही, भीतर भी वही || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
बाहर भी वही, भीतर भी वही || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
12min
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सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥

वह परमात्मा सहस्त्र सिर वाला, सहस्त्र नेत्रों वाला और सहस्त्र पैरों वाला है। वह सम्पूर्ण जगत को सब ओर से घेर कर भी दस अंगुल बाहर (सम्पूर्ण रूप से) स्थित है अथवा नाभि से दस अंगुल ऊपर हृदयाकाश में स्थित है।

~…

कौन है सबका ज़िम्मेदार? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
कौन है सबका ज़िम्मेदार? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13min
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या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥

पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता, हे रुद्रदेव! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें।

यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसी: पुरुषं जगत्‌॥

हे हिमालयवासी सुखदाता!…

तुम्हारी चाहत में जान कितनी है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
तुम्हारी चाहत में जान कितनी है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
9min
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। क्या चेतना और सत्य भिन्न हैं? ये विवेक क्या होता है?

आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है सत्य। तो हम जैसे हैं, जीव की जो स्थिति होती है, उसमें चेतना और सत्य बिलकुल भी एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

सत्य…

जो त्याग बोध से उठे || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
जो त्याग बोध से उठे || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
9min
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सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहता्॥

वह परम पुरुष समस्त इंद्रियों से रहित होने पर भी उनके (इंद्रियों के) विषय-गुणों को जानने वाला है। सबका स्वामी-नियंता और सबका बृहद् आश्रय है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १७)

आचार्य प्रशांत: वह परम पुरुष, वह शुद्ध-मुक्त चेतना इंद्रियों द्वारा लाए…

सतह में व्याकुलता और गहराई में चैन || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
सतह में व्याकुलता और गहराई में चैन || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13min
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विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः।।

वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वही इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय…

तुम्हारी सीमा ही तुम्हारा दुःख है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
तुम्हारी सीमा ही तुम्हारा दुःख है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
5min
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विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः॥

वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वहीं इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय…

तुम कभी मरते नहीं || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
Adhyatma Upanishad
तुम कभी मरते नहीं || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
5min
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एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥

वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,…

बस दो विकल्प होते हैं - दुःख या ब्रह्म || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
बस दो विकल्प होते हैं - दुःख या ब्रह्म || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13min
15reads

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥

जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वह अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३,…

ख़ास अनुभव की चाहत! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
ख़ास अनुभव की चाहत! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
5min
12reads

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति।।

जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३,…

ऋषियों ने निर्गुण के गुण क्यों बताए? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
ऋषियों ने निर्गुण के गुण क्यों बताए? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
27min
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आचार्य प्रशांत: ब्रह्म को किन-किन उपाधियों से इंगित किया गया है, विभूषित किया गया है, कहो जैसे? अनिकेत। अनिकेत कह दिया वहीं से शुरुआत कर लो। तो तुम्हारे सामने दो विकल्प आ रहे हैं, एक विकल्प ऐसा है जो तुमको इस धरती पर ही किसी पार्थिव वस्तु से, व्यक्ति से…

निराश्रित और सबका प्रथम कारण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
निराश्रित और सबका प्रथम कारण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
8min
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यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोअस्ति कष्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरूषेण सर्वम्॥

जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल जो आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण…

संसार है रसोई और परमात्मा है पकवान || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
संसार है रसोई और परमात्मा है पकवान || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
8min
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यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदनं पूणं पुरुषेण सर्वं॥

जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण विश्व संव्याप्त है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय…

सामर्थ्य सीमित, पर लक्ष्य असीमित || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
सामर्थ्य सीमित, पर लक्ष्य असीमित || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
10min
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प्रश्नकर्ता: क्या जीवन को उसकी उच्चतम संभावना में जीना ही ब्रह्म को पाना है? जीवन के पार भी कुछ है?

आचार्य प्रशांत: जीवन के पार कुछ भी नहीं है। ठीक है? बिलकुल इस भ्रांति से बाज आ जाइए कि अध्यात्म जीवन के पार या मृत्यु के पार इत्यादि किसी अन्य…

माया बाहर नहीं, भीतर है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
माया बाहर नहीं, भीतर है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
5min
9reads

प्रश्नकर्ता: माया की गति, आपने कहा, इतनी तेज़ है जैसे मक्खन में छुरी। हम समझ भी नहीं पाते और सब कुछ घट जाता है। तो फिर हम माया की गति कैसे कम करें ताकि हमको चुनाव का समय मिल जाए?

आचार्य प्रशांत: अच्छा हुआ मैंने कह दिया कि सवाल भेजिए…

प्रकृति मुक्ति में सहायक या बाधक? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
प्रकृति मुक्ति में सहायक या बाधक? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
7min
14reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों होती है?

आचार्य प्रशांत: ये नया है। (हँसते हुए) प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों होती है? प्रकृति ने ऐसा क्या किया, भाई? तुम प्रकृति ही हो। तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से…

माया का नकार ही सत्य का स्वीकार है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
माया का नकार ही सत्य का स्वीकार है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
12min
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यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः।।

जब योग साधना से युक्त साधक दीपक के सदृश आत्मतत्व के द्वारा ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार करता है, तब वह अजन्मा, निश्चल, सम्पूर्ण तत्वों से पवित्र उस परमात्मा को जानकर सम्पूर्ण विकार रूप बंधनों से मुक्ति पा लेता…

आत्मसाक्षात्कार का अर्थ || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
आत्मसाक्षात्कार का अर्थ || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
27min
6reads

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् । तद्वाऽऽत्मतत्तवं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः॥

जिस प्रकार मिट्टी से मलिन हुआ रत्न या आभूषण शोधित होकर प्रकाशमय हो कर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्व का साक्षात्कार कर के शोकादि से मुक्त होता है और अद्वितीय तथा कृतकृत्य हो…

ब्रह्म को चुनना || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
Adhyatma Upanishad
ब्रह्म को चुनना || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
8min
14reads

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्दस्मान्नाणीयो न ज्यायोस्ति कश्चित। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥

जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त…

न तुम हो, न दुनिया है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
न तुम हो, न दुनिया है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
6min
9reads

यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश। य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः।।

जो परमात्मा अग्नि में है, जो जल में है, जो समस्त लोकों में संव्याप्त है, जो औषधियों तथा वनस्पतियों में है, उस परमात्मा के लिए नमस्कार है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय २, श्लोक १७)

आचार्य प्रशांत:…

योग की पहली सिद्धि || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
योग की पहली सिद्धि || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13min
12reads

लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं खरसौष्ठवं च। गंधः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगवृत्तिं प्रथमा वदंति॥

शरीर की स्थूलता कम होना, निरोग होना, विषयों में आसक्ति न होना, शरीर में कांति-तेजस्विता होना, स्वर की मधुरता, शुभ गंध का होना, मल-मूत्र अल्प होना, ये सब योग की पहली सिद्धि है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक १३)…

जिसे मृत्यु छू नहीं सकती || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
जिसे मृत्यु छू नहीं सकती || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
9min
5reads

पृथ्व्याप्य तेजोऽनिलस्वे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरं॥

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — इन पाँचों महाभूतों का सम्यक उत्थान होने पर इनसे सम्बंधित पाँच योग विषयक गुणों की सिद्धि होने पर जिस साधक को योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो जाता है,…

गहरे ध्यान में जीना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
गहरे ध्यान में जीना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
8min
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नीहारधूमार्कानलानिलानां खद्योतविद्युतस्फटिकशशिनाम्। एतानिरूपाणिपुरःसराणि ब्रह्माण्यभिव्यक्तिक राणि योगे॥

योग साधना प्रारम्भ करने पर ब्रह्म की अभिव्यक्ति स्वरुप सर्वप्रथम कुहरा, धुआँ, सूर्य, वायु, जुगनू, विद्युत्, स्फटिकमणि, चन्द्रमा आदि बहुत से रूप साधक के समक्ष प्रकट होते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय २, श्लोक ११)

आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से कैसे पढ़ें इसको?…

कुसंगति क्या? सुसंगति क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
कुसंगति क्या? सुसंगति क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
7min
18reads

समेशुचौशर्करा वह्वीवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोनुकूले न तु चक्षुपीडनेगुहा निवाताश्रयणेप्रयोजयेत्त॥

साधक को चाहिए कि वह समतल और पवित्र भूमि, कंकड़, अग्नि तथा बालू से रहित, जल के आश्रय और शब्द आदि की दृष्टि से मन के अनुकूल, नेत्रों को पीड़ा ना देने वाले (तीक्ष्ण आतप से रहित), गुहा आदि आश्रय स्थल में…

एकै साधे सब सधै || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
एकै साधे सब सधै || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
11min
13reads

प्राणान्प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः श्रीणे प्राणे नासिकयोच्छवसीता। दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धास्येताप्रमत्तः॥

विद्वान् पुरूष को चाहिए कि आहार-विहार की सभी क्रियाओं को विधिवत् सम्पन्न करते हुए प्राणायाम की क्रिया करके जब प्राण क्षीण हो तो उसे नासिका से बाहर निकाल दे। जिस प्रकार सारथी दुष्ट अश्वों से युक्त रथ को अत्यन्त सावधानी…

कैसे तरें भवसागर? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
कैसे तरें भवसागर? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
16min
5reads

त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणी मनसा सन्निरुध्या। ब्रह्मोडुपेण प्रतरेत विद्वानस्त्रोतांसि सर्वाणि भयावहानी॥

विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह सिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन तीनों को सीधा और स्थिर रखे। वह उसी दृढ़ता के साथ सम्पूर्ण इन्द्रयों को मानसिक पुरुषार्थ कर अंतःकरण में सन्निविष्ट करे और ॐकार रूप नौका द्वारा सम्पूर्ण…

स्वयं के भीतर जाना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
स्वयं के भीतर जाना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
15min
5reads

आचार्य प्रशांत: आठवें श्लोक के अगले अंश पर आओ।

“दृढ़ता के साथ इन्द्रियों को मानसिक पुरुषार्थ कर अंतःकरण में सन्निविष्ट करें।”

माने इन्द्रियों को और मन को अंतःकरण - माने यही छाती, हृदय, जो कि सत्य का और आत्मा का प्रतीक है - इन्द्रियों को अंतःकरण तक ले आना, माने…

योग और वेद का समागम || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Adhyatma Upanishad
योग और वेद का समागम || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
16min
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त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिरुध्या। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्त्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि॥

विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह सिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन तीनों को सीधा और स्थिर रखे। वह उसी दृढ़ता के साथ सम्पूर्ण इंद्रियों को मानसिक पुरुषार्थ कर अंतःकरण में सन्निविष्ट करे और ॐकार रूप नौका द्वारा सम्पूर्ण…

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