
औरतों से मुझे जितनी शिक़ायत है, उतना ही उनको लेकर के दुःख भी है। उनको देखता हूँ, बहुत दुःख लगता है। और शिक़ायत इस बात की है कि वो अपने दुःख का कारण स्वयं हैं। भावना को वो अपना हथियार समझती हैं। देह को वो अपनी पूंजी समझती हैं। देह…

हम इज़्ज़त को बहुत बड़ी बात समझ बैठते हैं। हमारे जीवन का, समय का, ऊर्जा का, ध्यान का न-जाने कितना बड़ा भाग सिर्फ़ दूसरों की नज़रों में अपनी छवि चमकाने में लग जाता है, है न?
हमारी एक-एक भावना अन्ततः सिर्फ़ एक उद्देश्य के लिए है – इस शरीर को…

कोई तुम्हें तुम्हारी ग़लती दिखाए और बुरा अगर तुम्हें लगता है, तो तुम जवान कभी-भी होने से रहे। जिसे जवान होना होता है वो अपनी ग़लतियों का सामना करता है। बहुत होते हैं मोटी खाल के बेशर्म टट्टू, उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। उन्हें दिख रहा होगा कि ज़िंदगी…

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमें क्या सिखाती है?
आचार्य प्रशांत: कुछ सिखाती नहीं है, बस है। आप प्रकृति की बात कर रहे हैं। प्रकृति से तो यही जान लीजिए कि आपके भीतर जो प्रकृति बैठी है, वो बिलकुल वैसी ही है जैसे ये पेड़-पौधे, जानवर।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने परिजनों की मृत्यु के साथ पीड़ा क्यों आती है?
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं मोटी-मोटी। पहली बात तो ये है कि जो कुछ भी अपना है वो अपनी हस्ती का, अपनी अस्मिता का अंग बन जाता है तो वो जब छिनता है तो ऐसा लगता है…

प्रश्नकर्ता: काम को ले कर मैं पूरा श्रम नहीं करता; पता होते हुए भी नहीं करता। जैसे नींद आती है पढ़ाई के समय। एक तरह की बेईमानी भी है। उस काम में मेरी पूरी रुचि नहीं होने का एक कारण यह भी रहा है कि वो चीज़ मूल्यहीन लगती रही…

प्रश्नकर्ता: भावनाओं से अनछुए नहीं रह पाती हूँ। विवेक कहता है कि भावनाओं को देखो, उनसे प्रभावित नहीं हो लेकिन फ़िर भी मैं प्रभावित हो जाती हूँ। कभी चिल्ला देती हूँ, कभी रो देती हूँ, तो इससे कैसे निजात पाएं कि मन एकदम स्थिर हो जाए।
आचार्य प्रशांत: दो तरीके…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं तो सच की राह पर ही चलना चाहता हूँ मेरे हिसाब से, लेकिन परिवार वाले कहते हैं, "तुम ज़िम्मेदारी निभाओ!" मतलब जो भी सामाजिक दायित्व हैं उनको पूरा करो, फैमिली (परिवार) बनाओ।
आचार्य प्रशांत: उनको बोलो, "फिर तुम काहे के लिए हो? हम ही सब करेंगे…

प्रश्नकर्ता: मैं एक घरेलू महिला हूॅं और दिनभर काम करते वक़्त दिमाग में विचार घूमते रहते हैं, इन पर काबू कैसे करें?
आचार्य प्रशांत: कभी भी ये ना कहिएगा कि मेरे विचार मेरे विचार है। बंदर को याद रखियेगा। आपके विचार आपके विचार नहीं है। आपको जो चाहो वो सुचवाया…

वक्ता: एक आम दिमाग कैसा होता है? एक आम दिमाग कैलकुलेटिव (गणनात्मक) होता है| तो, जब भी उसे दिखाना होता है कि अब वो कैल्कुलेट (सोच-विचार) नहीं कर रहा है, वो सच्चा है, वो बना-बना के नहीं बोल रहा है, वो जोड़-तोड़ नहीं कर रहा है, तो वो इमोशनल (भावुक)…

वक्ता: सम्मान वो नहीं है, जो हम समझते हैं। वो डर बस है। सम्मान के नाम पर हम डरे रहते हैं कि अगर किसी का सम्मान करते हो, तो उसके सामने मुँह न खोलो। वो डर बस है। सम्मान शब्द का अर्थ भी बस इतना ही होता है: ठीक से…

जब हमारा दमन होता है तब जिस ऊर्जा का दमन हो रहा होता है, वह ऊर्जा हममें सड़ने लगती है। वही ऊर्जा जो एक फूल बन सकती थी, काँटा बन जाती है। जिस ऊर्जा से विकास हो सकता था, वह थम कर बदबू देना शुरू कर देती हैl ऊर्जा…

प्रश्नकर्ता: एक वृत्तियों का बहाव होता है तो वो वाला हमारा है। वो चलता रहता है उसको देखना या उसको रोकना भी तो एक एक्शन (कर्म) हुआ?
आचार्य प्रशांत: देखो, जितने भी फ्लोज़ (बहाव) हैं, इनको रोकना या देखना, तुम जितनी भी इनके बारे में बातें करोगे उन सारी बातों…

प्रश्नकर्ता: स्वीकृति, मान्यता हमारे लिए इतना महत्व क्यों रखती है? जब कोई नहीं होता तो हम ख़ुद अपने-आप को अपनी स्वीकृति देने लगते हैं।
आचार्य प्रशांत: स्वीकृति से, मान्यता से नियंत्रण का भाव आता है। "जो हो रहा है वो मेरे चाहे हो रहा है। मैं पूरे नियंत्रण में हूँ।…

श्रोता: सर एक बात समझ में नहीं आती कि हम हैं क्या? जो हमारी इन्द्रियाँ हमें दिखाती हैं हम वही हैं क्या या कुछ और?
वक्ता: हमें बड़ी आसानी हो जाती है यह मान लेने में कि जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वो सिर्फ द्वैत का एक भ्रम…

प्रश्नकर्ता: सर, क्या किसी भी व्यक्ति की भावनाएँ ग़लत हो सकती हैं?
आचार्य प्रशांत: भावनाओं के अलावा और कुछ ग़लत होता ही नहीं!
भावना क्या है, इसको समझो।

प्रश्न: इसका क्या मतलब है कि, “ट्रू ऑब्ज़रवेशन इज़ विदाउट थॉट(असली अवलोकन बिना विचार के होता है)”? इसको कृष्णमूर्ति बहुत बार कहते हैं कि, “ट्रू ऑब्जरवेशन इज़ ऑलवेज़ विदाउट थॉट।”
वक्ता: सोच-सोच के कुछ भी देख कैसे सकते हैं? थॉट विल एनलाइज़, थॉट विल नॉट ओब्ज़र्व, थॉट विल नॉट…

प्रश्नकर्ता: क्या संवेदनशीलता भी किसी प्रकार की वृत्ति है?
आचार्य प्रशांत: संवेदना–सम्+वेदना। मूल शब्द है ‘विद्’; ‘विद्’ का अर्थ है ‘जानना’। वो वही शब्द है जिससे वेद निकले हैं। ‘विद्’ से ‘विद्या’, वेदना उठती ही इसलिए है क्योंकि तुम्हारे भीतर कुछ है जो जानता है कि तुम्हारे तरीके झूठे हैं।…

प्रश्न: सर मैं सॉफ्ट-हार्टेड हूँ। मैं बहुत जल्दी भावुक जो जाती हूँ। क्या करूँ?
वक्ता: यह ध्यान से समझना होगा कि जो भी भाव उठते हैं उनके पीछे एक विचार होता है। बिन विचार के भाव नही आ सकता। हम लोग भाव को बहुत ज़्यादा महत्व दे देते हैं। हम…



Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।



पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…

हम कहते हैं कि अब कुछ नया करते हैं, फ़ूड योगा , मूड योगा * । कोई ऐसा शब्द नहीं है जो अब * योगा के साथ नहीं जोड़ दिया गया है। नई-नई क्रियाएँ निकल रही हैं, नई-नई प्रक्रियाएँ निकल रही हैं। ये मुद्रा, ये आसान, ये करते हैं, वो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम लोग कुछ भी करने बैठें, जैसे पढ़ने बैठें, योग करें, मैडिटेशन करें, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियन्त्रित…

लड़का-लड़की पंद्रह साल के हुए नहीं कि माँ-बाप बन सकते हैं, फिर? बहुत अक्ल आ जाएगी उनमें? और फिर जो बच्चा पैदा हो उसको सिखाएँ कि, “यह देवी-देवता हैं, हमने पैदा किया है।“ वह देवी-देवता ने नहीं पैदा किया है, वह पैदा इसलिए हो गया था क्योंकि देवी जी बहकी…

“ओ ले-ले-ले! मेला शोमू कितना स्टुपिड है!" अरे! स्टुपिड (मूर्ख) है तो यह बोलने के लिए भी काहे को रुकी कि शोमू स्टुपिड है? भाग! जान बचाकर भाग। पर शोमू क्यूट ही इसीलिए है क्योंकि वह स्टुपिड है। अजीब बात है! तुमको पता है वह स्टुपिड है पर तुम तब

लड़कीवाले लड़की देने को राज़ी नहीं होते अगर सरकारी नौकरी नहीं है। और कोई वजह हो-न-हो, वंश चलाने की ख़ातिर हमें यूपीएससी निकालना पड़ेगा। ‘वंश चलाने के लिए यूपीएससी निकालना पड़ेगा!’ यह सब तो तुम्हारे सारे कारण हैं सरकारी नौकरी के पीछे जाने के, नहीं तो और तुम क्यों इतने…

यह सब अय्याशियाँ होती हैं, “मन कर रहा है, मन नहीं कर रहा है, आज दिल तन्हा सा है, उदास सा है।“ यह क्या है? मन गया भाड़ में! इधर काम रखा हुआ है, जो ज़रूरी चीज़ है वह करेंगे न, मन का क्या है!

लोग कहते हैं सच्चा प्यार मिलता नहीं, मैं कहता हूँ सच्चा प्यार तुमसे बर्दाश्त होता नहीं। मिल तो आज जाए, झेल लोगे? बड़े अफ़साने लिखे जाते हैं, शायरों की दूकान ही चल रही हैं इसी बात पर कि ‘हम तो बड़े क़ाबिल थे पर कमबख़्त ज़िंदगी ने धोखा दे दिया,…

सबसे पहले यह समझो कि दूसरे तुम में कमज़ोरी देख रहे हैं न, इसीलिए तुम पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वह तुममे कमज़ोरी देखेंगे ही नहीं तो तुम पर चढ़ने की कोशिश भी नहीं करेंगे। बात यह नहीं है कि उसने जो भी कहा है वह सही…

यह एक बड़ा भ्रम कि जल्दी से शादी कर लो और शादी करने से दूसरा व्यक्ति ज़िम्मेदार हो जाएगा। जो माँ-बाप कहते हैं, “ये बड़ा उद्दण्ड है, लड्डू। गाँव भर में लुढ़कते फिरता है लड्डू। तो लड्डू को ज़िम्मेदार बनाने के लिए लड्डू की शादी कर देते हैं।” घर में…

यह जगत तो लाभ का सौदागर है। वो आप से नहीं प्रेम करता; आपसे जो मिल रहा है उसे से प्रेम करता है। और इस बात का बड़ा कड़वा अनुभव आपको तब होता है जब आप देना बंद कर देते हैं। आप तो यही सोचते रह गए कि उस व्यक्ति…

दूसरे आपका हाथ मरोड़ रहे हैं, समझिए क्यों। क्योंकि आप हाथ मरोड़वाने के लिए तैयार खड़े हैं।
धोखा एक बार हो सकता है न, बार-बार हो तो इसका क्या मतलब है? कोई व्यक्ति आपके साथ एक बार दुर्व्यवहार कर गया, ठीक। बार-बार कर रहा है, क्या मतलब है इस बात…

आजकल चलती है ‘*पाउटिंग*’!
डैडी डार्लिंग यूँ थुथुन निकालेंगे – पाऊट माने थुथुन, जैसे सुअर का होता है – तो डैडी डार्लिंग यूँ निकालेंगे और कैटी डार्लिंग निकालेंगी, “ऊँ!” और कैटी डार्लिंग अभी हैं कुल डेढ़ साल की, और फिर दोनों थुथुन से थुथुन मिलाएँगे।
और कांटेस्ट (प्रतिस्पर्धा) होगा! “*हू

ये ब्रेकअप होता क्या है? तुम्हें अगर प्रेम है तो क्या तुम तय करके किसी से दूर हो सकते हो? कर कैसे लोगे? ये बात तो हृदय की होती है, आत्मा की होती है। तुम तय थोड़े ही करोगे कि कल से इससे बात नहीं करनी है क्योंकि हमारा ब्रेकअप…

कहते हैं, “हमारे घर में बहुत खुला हुआ माहौल है। मैं तो अपने चौदह साल के लड़के के साथ बैठ कर ड्रिंक करता हूँ। बहुत लिबरल माहौल है हमारे घर का।“
ये लिबरल माहौल है या नरक का माहौल है? नरक और कौन-सी जगह होती है? वही तो जहाँ बाप…

ये तुम्हारी ज़िन्दगी को समझने की उम्र है। कहाँ तुम ये रिश्तेबाज़ी में फँस रही हो? उसके लिए बहुत समय पड़ा है। पहले थोड़ा मन को जान लो, जीवन को जान लो। समझ तो लो तुम्हारे भीतर वो कौन-सी वृत्ति बैठी है जो खिंची जा रही है लड़कों की ओर।…

जिस साल मेरा चयन हुआ था, पाँच लाख बैठे थे और सीट थी मुश्किल से, मेरे ख्याल से, ढाई-सौ, तीन-सौ। वो जो पूरी प्रक्रिया है वो बनी ही ऐसी है कि उसमें से हज़ार में से नौ-सौ-निन्यानवे लोग अचयनित ही निकलेंगे और यह बात तुमको पहले से पता होती है…

यही जीवन जीने की कला है, मौज करो, मस्ती करो! गंभीर मत हो जाना। बिलकुल हल्के रहो, क्योंकि रखा क्या है?
आज तुम जिस बात को गंभीरता से लेते हो, कल वो तुम्हारे लिए दो पैसे की हो जाएगी। याद है, जब चौथी-पाँचवी में रिज़ल्ट आया था तो तुम कैसे…

एक साधारण-सी दिखने वाली लड़की हो, स्कूल में या कॉलेज में वो जब पढ़ाई करेगी, ऊँचा स्थान लाएगी, या खेलों में जीतकर दिखाएगी या किसी और क्षेत्र में अपना हुनर दिखाएगी, उसको तब जाकर के कुछ ध्यान, कुछ अटेंशन मिलेगा। और जो सुंदर लड़की होगी वो कुछ नहीं, वो एक…

हम दूसरे की ज़िंदगी में घुसकर के उसको शांत नहीं करते, जो थोड़ी बहुत शांति उसके पास रही भी होती है पहले से, हम उसकी वो शांति भी लूट लेते हैं; मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मत घुसो दूसरे के जीवन में।
तुम अगर वाकई ईमानदारी से यह सोचते…

जो अपनी ग़लती स्वीकारेगा नहीं, उसकी सज़ा ये होगी कि वही अपनी ग़लती दोहराएगा। ग़लती स्वीकार लो, ग़लती से मुक्त हो जाओगे। दूसरों को दोष देते रहोगे, मानोगे ही नहीं कि ग़लती तुमने करी तो उसी ग़लती को बाध्य हो जाओगे दोहराने के लिए। ग़लती मानना बड़ी बहादुरी का काम…

ना संसार से डरो, ना सरकार से डरो, ना डरो दुनिया के तानों से, ना डरो अधूरे अरमानों से, डरो तो बस ज़िंदगी के बर्बाद चले जाने से। घड़ी की टिक-टिक को अपना दोस्त बना लो, हर घण्टे-दो- घण्टे पूछा करो अपने-आप से, “अपने समय का जो मैं ऊँचे-से-ऊँचा, बढ़िया-से-बढ़िया…

जिसने तुमको चोट पहुँचाई उसने तुमको इसीलिए चोट पहुँचाई न कि तुम्हें वो चोट पहुँचाए और तुम आंतरिक रुप से आहत हो जाओ? तो दुश्मन को तुम्हारा करारा-से-करारा जवाब क्या हो सकता है? उसके उद्देश्य को पूरा मत होने दो।
वह सोच रहा था कि वो तुमको गाली दे देगा…

ग़लती मानना बहुत बड़े लोगों का काम है। छोटे आदमी की पहचान ही यही है कि वह अपनी ग़लतियों पर हमेशा पर्दा डालता नज़र आएगा। क्योंकि उसे छोटा ही रहना है, छोटा है छोटा रहना है। वह ग़लती पर बार-बार पर्दा डालेगा, स्वीकारेगा नहीं। बड़े आदमी को छोटा रहना नहीं…
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
मनचलों के लिए दुनिया की…