
यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किंचिन्-
मा गृहाण विमुंच मा॥८- ४॥
अनुवाद: जब तक 'मैं' या 'मेरा' का भाव है तब तक बंधन है, जब 'मैं' या 'मेरा' का भाव नहीं है तब मुक्ति है। यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही…

प्रश्नकर्ता: मुक्ति क्या है? एक तो ये नज़रिया हो सकता है मुक्ति का कि जैसे हम लोग कैम्प में आए हैं, तो यहाँ पर एक पैटर्न है, एक रूटीन है। तो वो रूटीन एक बंधन की तरह लगता है। उससे निकल कर कहीं और कुछ और हम लोगों को कुछ…

प्रश्नकर्ता: सर, हम पी.एच.डी. कर रहे हैं और जब से अध्यात्म की ओर आए हैं तब से लगता है कि मेरा जो पढ़ाई का विषय है - मैं गणित में पी.एच.डी. कर रही हूँ - इन सबका कोई भी ज्ञान है, भौतिकी, रसायन शास्त्र, जीवविज्ञान इत्यादि का, उसमें मुझे रुचि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पिछले कुछ सत्रों में कहा कि प्रकृति मुक्ति चाहती है और उसके लिए वो इंसान के शरीर का इस्तेमाल करती है। ये प्रकृति कुछ भी चाह कैसे सकती है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति का काम है चाहना। अभी तुम यहाँ खड़े हो, तुम्हें कहीं भी कुछ भी…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये था कि अभी थोड़ी देर पहले जैसा आपने कहा कि मरकर भी तुम्हें इन देहभाव से, जो यह देह का जो बंधन है उससे मुक्ति नहीं मिलेगी, और यही सबसे बड़ा बंधन है और यही पहला बंधन है, और यही सबसे ज़्यादा दुखदाई है, और इससे…

प्रश्नकर्ता: एक सामान्य व्यक्ति की इच्छा होती है कि जीवन में शांति मिले और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाए। जो मान्यता हम मुक्ति की समझते हैं वो ये है कि जीवन-मरण से मुक्ति मिल जाए।
प्रश्न मेरा ये है कि द्वैतवाद और अद्वैतवाद में कौनसा मार्ग ऐसा है…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी आपने बोला कि मैन इज़ नॉट इन द नेचर, ओनली मैन इज़ डिजाइन्ड फॉर लिबरेशन (मनुष्य प्रकृति में नहीं है, केवल मनुष्य को मुक्ति के लिए बनाया गया है) लेकिन मैन (मनुष्य) का जो शरीर है पूरा वो आया तो प्रकृति से ही है। तो प्रकृति…

प्रश्नकर्ता: गुरुदेव, मैं पूछना चाहता हूँ कि कुछ महापुरुष ध्यान साधना करके मुक्ति पाना चाहते हैं, और कुछ आत्मज्ञान होने के बाद भी बार-बार धरती पर आना चाहते हैं दुनिया के सुधार के लिए, ताकि दुनिया उनका अनुसरण कर सके और सुधार हो सके। तो, दोनों में से कौन-सा ठीक…

प्रश्नकर्ता: संसार में फैलने की उक्तियाँ और विधियाँ तो हमें पता पड़ जाती हैं पर ऊपर उठने की कौन सी विधियाँ हैं? वो कौन से प्रैक्टिसेस हैं जिनसे हम अपने को ऊँचा उठा सकें ?
आचार्य प्रशांत: नहीं, प्रैक्टिसेस कोई नहीं है। अपने दर्द का पता होना चाहिए। जब आप…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भविष्य में कभी बीमार हुए तो उसके लिए अभी से ही पैसों की व्यवस्था करके रखना होगी न?
आचार्य प्रशांत: बीमारी जब आएगी उसके लिए तुम अभी से बीमारी का जीवन जीना चाहते हो? तुम्हें इतनी घनी और इतनी बड़ी बीमारी आ गयी कि नहीं जी सकते…

आचार्य प्रशांत (आचार्य): ग्रंथों का श्लोक हो, गुरुओं का आप्त वाक्य हो, किसी ज्ञानी का आर्ष वचन हो, कभी भूलना नहीं है कि उसमें कुछ भी आपके ज्ञान की बढ़ोत्तरी के लिए नहीं कह दिया जाता; उसमें कुछ भी इसलिए नहीं कह दिया जाता कि आपको संसार के बारे में…

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥५३ ||
~ अष्टावक्र गीता

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, विद्या और अविद्या क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: जो जन्म ले वो है अविद्या और जिससे अहम भाव समाप्त हो जाए वो है विद्या। ध्यान से समझेंगे।
देखिए इस पर बड़ा संशय रहा है और बड़े तरीकों से विद्या और अविद्या की परिभाषा करने की कोशिश की गई

निर्वासनो निरालंब: स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः । क्षिप्त: संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २१
अनुवाद: वह वासना, आलंबन, परतंत्रता आदि के बंधनों से स्वच्छंद होता है। प्रारब्ध रूपी वायु के वेग से उसका शरीर उसी प्रकार गतिशील रहता है, जैसे वायु वेग से सूखा पत्ता।

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्।।
~अष्टावक्र गीता
अध्याय १८, श्लोक २०

क्व मोहः क्व च वा विश्व क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥
~ अष्टावक्र गीता
( अध्याय १८ श्लोक १४ )

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।१३.२।।
अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ(अर्थात् नहीं) हैं, वाणी के दुःख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।

समस्त कल्पनामात्र - मात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
~ अष्टावक्र गीता

विहाय वैरिणं कामम-र्थं चानर्थसंकुलं।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रा ना दरं कुरु॥१०- १॥
अनुवाद: जब तक जीवन स्वार्थों के पीछे भाग रहा है, तब तक जीवन में आनंद का होना ना मुमकिन है।

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि
यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किंतु
निर्ध्यायेति विचेष्टते॥१८- ३१॥

*स्वातंत्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातंत्र्याल्लभते परं। *
स्वातंत्र्यान्निवृतिं गच्छेत्स्वातंत्र्यात् परमं पदम् ॥५०॥
आचार्य प्रशांत: स्वतंत्रता से ही सुख की प्राप्ति होती हैं। स्वतंत्रता से ही परम तत्व की उपलब्धि होती है। स्वतंत्रता से ही परम शांति की प्राप्ति होती है। स्वतंत्रता से ही परम पद मिलता है।

आचार्य प्रशांत: क्या कर रहे थे आप लोग रात में? शोर मचा रहे थे? लेटा हुआ था मैं, बहुत आवाज़ें आ रही थी। क्या कर रहे थे?
प्रश्नकर्ता: गा रहे थे।
आचार्य: क्या गा रहे थे?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन के बारे में बहुत बोला जाता है कि मन चंचल है, ये है, वो है, लेकिन अगर हम मूल की बात करें तो मन क्या है, क्या वह बुद्धि है या अहंकार? जब हम पैदा हुए, तब से लेकर अब तक की जो याददाश्त है, वो…

प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, मेरा मन हमेशा के लिए किसी एकांत जगह पर जाकर ध्यान साधना और भक्ति में डूबने को करता है लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांतः देखो बेटा, अभी थोड़ी देर पहले ही मैं कह रहा था कि जब घर में आग लगी हो,…

प्रश्नकर्ता: क्या सभी के सामने झुक जाने से हमारा अहंकार कटता है?
आचार्य प्रशांत: क्यों झुकोगे सभी के सामने? और सभी के सामने तो तुम झुकते भी नहीं। जब कह रहे हो 'सभी के सामने,’ तो दस, बीस, चालीस, दो-सौ, पाँच-सौ लोगों की बात कर रहे होगे। सभी माने इस…

प्रश्न: आचार्य जी, लाल देद कह रही हैं, "देखते हुए अनदेखा करो; जानते हुए से अंजान बनो; और सुनते हुए को अनसुना करो," वैसे ही मैं एक गृहणी होते हुए किस तरीके से अपने अध्यात्म की ओर बढ़ रहे सभी क़दमों को अनदेखा कर सकती हूँ? क्या उनको अनदेखा करना…

प्रश्न: आचार्य जी, युवा लोगों को सबसे पहले अपने करियर (व्यवसाय) पर ध्यान देना चाहिए, या मुक्ति पर ध्यान देना चाहिए? जब अंतिम लक्ष्य मुक्ति है तो क्या उसके बारे में प्रयत्न करते रहना चाहिए या नहीं?
आचार्य प्रशांत: दोनों अलग-अलग आयाम की बातें हैं, बेटा।

प्रश्नकर्ता: आत्मिक आज़ादी की ओर कैसे बढ़ें?
आचार्य प्रशांत: कसाई के पिंजड़े देखे हैं न? उसमें कुक्कड़ मुर्गा और गुटरी मुर्गी बैठकर चर्चा कर रहे हैं कि, "क्या महाराष्ट्र का हाल भी कर्नाटक जैसा होगा?” और थोड़ी ही देर पहले उन्होंने देखा है कि पिंजड़े में एक हाथ भीतर आया…

प्रश्नकर्ता: गुरु की पहचान क्या है?
आचार्य प्रशांत: गुरु की पहचान ही क्या है?
जो मुक्ति दिला दे, सो गुरु।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगर मुझे लगता है कि स्वयं के प्रयास करके मुझे मुक्ति मिलेगी, तो उसमें एक तो मानसिक बंधन होते हैं, वो तो मैं अपने स्तर पर हटा सकता हूँ। लेकिन मान लीजिए कुछ ऐसे बंधन हैं, जैसे देश का क़ानून किसी चीज़ की आज्ञा नहीं देता, और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शराब से मुक्ति मिलेगी क्या?
आचार्य प्रशांत:
हर चीज़ से मुक्ति मिल जाती है इस संसार में। बस होता ये है कि इंसान एक तरह की शराब छोड़कर दूसरे तरह की शराब पीने लग जाता है। तो शराब से मुक्ति चाहिए, तो मिल जाएगी। ‘मुक्ति’ चाहिए क्या?…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रश्न है कि – साधक की यात्रा में अच्छे और सुन्दर कपड़े किस सीमा तक महत्व रखते हैं?
आचार्य प्रशांत:
हर वो चीज़, जो तुमको तुम्हारे नियमित जगत से आगे की याद दिलाती हो, उपयोगी है।

प्रश्न: आचार्य जी, जब हम किसी कष्ट में होते हैं, तो हमें कष्ट का निवारण पता होता है कि वहाँ से हो सकता है। लेकिन ये पता होने के बावजूद हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं।
ऐसा क्यों?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या यह पता लगाया जा सकता है कि बोध की प्राप्ति में अभी कितनी यात्रा बची है, या किसकी कितनी यात्रा हो चुकी है?
आचार्य प्रशांत: यात्रा लम्बी किसी की नहीं होती है। समझाने वालों ने ऐसा बोला, मैं भी ऐसा ही उदाहरण रख देता हूँ।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या ज्ञान प्राप्ति के लिए कर्म अनिवार्य है? कर्म के अलावा ज्ञान प्राप्ति के कौन-कौन से साधन हैं? ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग में बाधा क्या है?
आचार्य प्रशांत: ज्ञान की प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन तुम्हारी मुमुक्षा है। साधन तुमने कहा न। स्वयं आदि शंकराचार्य ‘साधन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी-कभी बहुत गहरा भाव उठता है कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर खड़ी हो जाऊँ, और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाऊँ और कहूँ, “अब और नहीं!” कभी अनजाने में खड़ी भी हो जाती हूँ, फिर ठिठक जाती हूँ। आचार्य जी, ये ज्ञान, विज्ञान, कर्म, मुझे कुछ समझ नहीं आता, और…

प्रश्न: आचार्य जी, हम क्यों अपने माता-पिता के निर्णयों के आगे हथियार डाल देते हैं?
आचार्य प्रशांत: तुम बताओ, तुमने डाले हैं।
प्रश्नकर्ता:

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आचार्य प्रशांत: नैन्सी का सवाल है कि, ‘अगर बताया गया कि अहंकार ‘मैं’ है तो इसके साथ बड़ी समस्याएं हैं, वो एक बीमारी के तरह भी…

प्रश्न: आचार्य जी, ‘ध्यान’ में, वृत्तियों को भी पकड़ा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: उससे ज़्यादा सही शब्द ‘ध्यान’ है या ‘ईमानदारी’ है। वृत्ति तो हर समय अपना ज़ोर दिखाती ही रहती है ना? उसके लिए, उसको पकड़ने के लिए, ईमानदारी ज़्यादा चाहिए। तुमने देखा नहीं है, कई बार कोई…

प्रश्नकर्ता: कोई तरीका है क्या रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भय से मुक्त रहने का?
आचार्य प्रशांत: बहुत तरीके हैं।
दिल में अगर सच्चाई के लिए श्रद्धा है, तो अनगिनत तरीके हैं। हर तरीका उसी क्षण की पैदाइश होता है जिस क्षण भय आघात करता है। मैं कोशिश करूँगा कुछ तरीके…

आचार्य प्रशांत: तुम एक बार ये समझ गए के ये डोमिनेशन(वर्चस्व) है, फिर ये काम कर नहीं सकता ! यह काम ही सिर्फ तभी करता है जब तुम नहीं जानते की ये वर्चस्व है ।
तुम वर्चस्व को कई बार प्यार समझ लेते हो, तुम वर्चस्व को कई…

प्रश्नकर्ता: आदर्श जीवन के लिए क्या परिभाषा है एक व्यक्ति के लिए कि उसके जीवन में ये ये हुआ था और वो आदर्श जीवन जिया?
आचार्य प्रशांत: तो बड़ी सुविधा हो जाएगी न? तुम्हें बता दिया है कि ऐसा है आदर्श जीवन, अब तुम्हें कुछ विचार नहीं करना। अब तुम्हें…

प्रश्नकर्ता: सर, हम जीवन में कोई भी प्रयास करते हैं, जैसे कि सफलता की तरफ उठाया गया कोई भी कदम, तो उससे हम हमेशा डरते क्यों है?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि तुम प्रयास पर कम और उसके परिणामों पर ज़्यादा ध्यान दे रहे होते हो। तुम्हें इस बात से तो बहुत…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी पहला सूत्र था “बंधनमुक्त”। इस मनोभाव की वजह से, अगर ये मनोभाव धीरे-धीरे हमारे अन्दर आ रहा है तो क्या हमारा व्यवहार थोड़ा घुमक्कड़ जैसा नहीं हो जाएगा? कि हम किसी चीज़ की परवाह नहीं करेंगे बिलकुल, हर चीज़ को हलके लेते जाएँगे, चाहे फिर जीवन…

रिश्ते में अगर आज़ादी नहीं तो रिश्ता झूठा है|
आचार्य प्रशांत: मालिक मने क्या?
श्रोता : अधिकार जमाने वाला।

प्रश्न: सर, एक चीज़ मन में बैठ गयी थी। ओशो ने कहा है, बाज़ार में ही रहना है, पहाड़ों में नहीं। तो अपनेआप को सिद्ध करने की चाह थी कि अब तो बाज़ार में ही रह कर शांत रहेंगे। तो वहाँ पर अभी भी संघर्ष है, अपने को साबित…

आचार्य प्रशांत: बताइए, क्या गा रहे थे?
श्रोतागण: कबीर गा रहे थे।
आचार्य: तो क्या कह रहे थे कबीर?

प्रश्न: जो मैंने अनुभव किया है वो यह है कि कभी-कभी ऐसा होता है कि हम कुछ चीज़ों को जानते हैं कि अहंकार, प्रेम है। तो जब हम इन चीज़ों को जीवन में अनुभव करते हैं तो अचानक से ही रिमाइंड होता है कि नहीं ये सब कुछ तो अहंकार…

वक्ता: प्रश्न है कि अपनी मज़बूरी को हम कभी स्वीकारना क्यों नहीं चाहते? अपना छोटा होना बर्दाश्त क्यों नहीं होता?
पहले तो कहते हो कि मज़बूरी है फिर कहते हो कि उसे स्वीकारना क्यों नहीं चाहते। पहले तो कहते हो कि छोटे हो फिर कहते हो कि छोटा होना बर्दाश्त…

श्रोता:मन लगातार छवियाँ बनाता रहता है, लगातार धारणाएँ बनाता रहता है। और हम कितनी भी कोशिश कर लें असंस्कारित होने की, पर हो नहीं पाते। कुछ न कुछ हिस्सा रह ही जाता है तो इसके बारे में क्या किया जाए?
वक्ता:देखिये, एक बात ये समझिएगा कि प्रभावित होने…
आचार्य प्रशांत: हमारे भोग भी छोटे होते हैं। और…
आचार्य प्रशांत:…
अनुवाद: जो धीर पुरुष है उसका न प्रवृत्ति से, न निवृत्ति से कोई आग्रह होता है। जब जो सामने आ जाता है तब उसे करके वह आनंद से रहता है।
आचार्य प्रशांत:…
अनुवाद: जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?
आचार्य…
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय -१३ , श्लोक…
अनुवाद: सब कुछ कल्पना मात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है। धीरपुरुष इस बात को जानकर फिर बालक के समान क्या अभ्यास करे? अर्थात् ज्ञानी के लिए अभ्यास निरर्थक है।
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: अधर्म को छोड़कर, जो इन दोनों का कारण…
अनुवाद: जीवन्मुक्त का चित्त ध्यान से विरक्त होने के लिए और व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता है। किन्तु निमित्त के शून्य होने पर भी वह ध्यान से विरत भी होता है और व्यवहार भी…
प्रश्नकर्ता: किस स्वतंत्रता की बात…
आचार्य: क्या अर्थ है उसका? कौन-सी चादर है? किस…
आचार्य प्रशांत: देखो तुम हथियार नहीं डालते हो, तुम व्यापार करते हो।
तुम…
श्रोता: सर, हमारा जो अहंकार वो हमें एक भ्रम दे देता है की हम मालिक हैं|
वक्ता: सत्य से सम्बंधित एक बहुत मूलभूत बात,…
आचार्य: क्या मतलब है इस बात का, “जिन को कुछ नहीं चाहिए, वो शाहन के शाह?” क्या हुआ अभिप्राय इसका? आपने…