
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15

आचार्य प्रशांत: तो सवाल है कि एक फ़िल्म आई थी 'द मास्क' के नाम से। उसमें जो मुख्य चरित्र था उसे एक मास्क मिल जाता है, एक मुखौटा मिल जाता है। उस मुखौटे के मिलने से उसे दुनियाभर की तमाम लड़ाइयों में जीत मिलने लग जाती है, शोहरत…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि जब सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वो अपूर्ण क्यों है?
आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है। चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं है। सत्य ही जब…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इंसान में इतना आजकल अपने आप को प्रूव (साबित) करने का इतना जोश क्यों होता है, कि दुनिया को प्रूव करके दिखाना है कुछ? मतलब जैसे आजकल टीवी पर भी देखते हैं, तो मैं एक शो में गया था; उसका ऑडिशन देने गया था, एम.टीवी पर आता…

प्रश्नकर्ता: जिस समाज में मैं प्रतिदिन जी रहा हूँ, उसमें ताक़त और प्रतिष्ठा ही सब कुछ है। जिसकी हैसियत और उपाधि ना हो उसे कोई सुनता भी नहीं और जो समाज में ऊँचे स्थान पर बैठा है, वो कुछ अनर्गल ही क्यों न बके वो परम-सत्य मान लिया जाता है।…

सर्वभूतेषु चात्मानं
सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं
ममत्वमनुवर्तते॥३- ५॥

प्रश्नकर्ता: रुमी की कोट्स(उक्तियाँ) पढ़ रहे थे।
आचार्य प्रशांत: रुमी के कोट्स, बताओ एक-आधे कोट्स।
प्रश्नकर्ता: “इफ यू डिजायर हीलिंग लेट् योरसेल्फ फॉल इल्ल” (यदि आप उपचार की इच्छा रखते हैं तो अपने आपको बीमार होने दें)

आचार्य प्रशांत: संदीप (श्रोता की ओर इशारा करते हुए) पूछ रहा है, "अपने ही लिए जीना चाहिए या दूसरों के लिए भी? हमारी कुछ ज़िम्मेदारियाँ हैं जिन्हें हमें निभाना पड़ेगा जैसे बेटा हूँ, भाई हूँ।" चलो, संदीप खुद ही बोलो।
प्रश्नकर्ता: सर, अब तक तो हम सोच रहे थे कि…

प्रश्नकर्ता: एक महिला होकर घर और कार्यस्थल में समुचित तादात्म्य कैसे स्थापित किया जाए?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जब आप कहती हैं कि - "एक महिला होकर घर और कार्यस्थल में समुचित तादात्म्य कैसे बैठाया जाए,” तो आप शायद अपनी पहचान के भीतर से ये सवाल कर रही हैं। आपने सवाल…

प्रश्न: आचार्य जी, हमारे अभिभावक, हमारे बड़े, जो भी सुझाव देते हैं क्या वो हमेशा सही होते हैं?
आचार्य प्रशांत जी: मैं बड़ा हूँ तुमसे, हूँ न? मैं जो जवाब दूँगा, तुम्हें कैसे पता वो सही होगा?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, स्वभाव क्या है?
आचार्य प्रशांत: क्यों पूछ रहे हो? क्योंकि जानना चाहते हो। नहीं जानोगे तो कैसा लगेगा?
प्र: अधूरा।

प्रश्न: आचार्य जी, बाहरी प्रभावों से कैसे बचा जाए?
आचार्य प्रशांत: (सत्संग शुरू होने के कुछ समय पहले आचार्य जी ने कुछ श्रोताओं को शांत होकर बैठने के लिए कहा। उसी बात का उल्लेख आचार्य जी ने उदाहरण के रूप में लिया।)

प्रश्न: आचार्य जी, हमारे देश कि जो सेना है, उनमें अगर राष्ट्रप्रेम न हो, देश की चिंता न हो, तो हम कोई भी जंग कैसे जीत सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: जब तुम अपने छोटे भाई से लड़ते हो तो वो बुरा माना जाता है, जब तुम अपने पड़ोसी…

आचार्य प्रशांत: तुम एक बार ये समझ गए के ये डोमिनेशन(वर्चस्व) है, फिर ये काम कर नहीं सकता ! यह काम ही सिर्फ तभी करता है जब तुम नहीं जानते की ये वर्चस्व है ।
तुम वर्चस्व को कई बार प्यार समझ लेते हो, तुम वर्चस्व को कई…

प्रश्न: आपकी प्रोफाइल देखी है, आपने आई. आई. टी. दिल्ली से इंजीनियरिंग की है और उसके बाद आई. आई. एम्. अहमदाबाद । तो उसके हिसाब से आप अब्रॉड में इस समय बहुत मजे से ऐश कर सकते थे ।
(अट्टहास)

प्रश्न: मेरा प्रश्न यह है कि भारत के संविधान में जब यह उल्लेखित है कि समानता का अधिकार सभी को प्राप्त है, तो फिर मुझे मेरी जाति के आधार पर आरक्षण का दंश क्यों झेलना पड़ा
आचार्य प्रशांत: नाम क्या है तुम्हारा?

श्रोता:सर, हम कैसे अपने निजता को पाएं? जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब हम उसे खो देते हैं।
वक्ता:तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता:अभिषेक।

आचार्य प्रशांत: हाँ, बोलो।
प्रश्नकर्ता: सर, अहंकार की वजह से प्रतिस्पर्धा आती है।
आचार्य: प्रतियोगिता हाँ।

प्रश्नकर्ता: मैं अपनी ऊर्जा और समय को कैसे दिशा दूँ, ताकि मैं सबसे अलग और अनूठा बन पाऊँ?
आचार्य प्रशांत: जो तुमने सवाल पूछा है, उत्तर बिलकुल इसी में बैठा हुआ है, सामने ही है। तीन बिन्दुओं का उत्तर है और तीनों तुम्हारे सवाल से ही निकल कर आ रहे…

अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुने:।
क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोअहम ममेति वा।।
(जो मुनि आत्मा को अक्षय व गतसंताप देखता है, उसके लिए कहाँ विद्या है और कहाँ विश्व है? उसके लिए कहाँ ‘मैं देह हूँ’, और कहाँ ‘देह मेरी है’ की भावना है?)

प्रश्नकर्ता: सर, ताकत पाने के लिए क्या किया जाए?
आचार्य प्रशांत: तुम में ताकत ही ताकत है, कमज़ोरी कहाँ है? तुम्हें क्यों लगता है कि कोई ख़ास ताकत होनी चाहिए तुम्हारी? ज़रूर कमज़ोरी का कुछ एहसास है जिसके कारण ताकत की बात कर रहे हो। ताकतवर कहाँ ताकत की बात…

वक्ता: सिर्फ निजता है, जो हक के साथ कह सकती है कि “मैं हूँ, बाकि कुछ है नहीं।’’ ‘है’ शब्द का प्रयोग करने का हक़ सिर्फ़ निजता को है; बाकि सब तो बस लगता है कि है। ‘वो’ वास्तव में है, सब कुछ उसी से उठता है। दो शब्द हैं…

प्रश्न: सर, आपका एक विडियो था उसमें बोला था कि *बीइंग ह्यूमन इज़ इंटेलिजेंस, बिकॉज़ अदरवाइस इट इज़ कंडीशनिंग*और सर, मानुष जन्म का मतलब भी यही हुआ कि अभी में स्थापित हो गए,बीइंग इन नाउ। तो वो भी और यह भी एक हैं?
वक्ता: उसमें कहीं कोई अंतर दिख…

वक्ता: तुम्हें किसने कह दिया कि बाहर से जो आ रहा है, इसके दो प्रकार होते हैं, अच्छा और बुरा?
श्रोता: ये ही सिखाया गया है, सर।
वक्ता: किसने, बाहर से?

श्रोता (वेदप्रकाश): रामकृष्ण ने कहा कि “मैं किसी भी स्त्री को देखता हूँ तो मुझे उसमें ‘दुर्गा’ या ‘काली’ दिखती हैं”, कृपया समझाएं।
वक्ता: रामकृष्ण ने कहा कि “मैं किसी भी स्त्री को देखता हूँ तो मुझे उसमें ‘दुर्गा’ या ‘काली’ दिखती हैं”, तो यह कोई विधि नहीं थी, यह…

वक्ता: वो जो छोटा आदमी है, जो उसको अपना आत्म-सम्मान बोल रहा है। तो वो आत्म-सम्मान कहाँ से आ रहा है? वो समाज के वातावरण से आ रहा है जिसमें बड़े लोगों को प्राथमिकता दी जाती है, ठीक? तो क्या ये वास्तव में उसका आत्म-सम्मान है या ये उसके…

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल यह है कि क्या हमें अपनी ज़िन्दगी हमेशा दूसरों के बताए हुए रास्ते पर ही चलानी चाहिए या हमारी ख़ुशी जिसमें है वो काम करना चाहिए? जैसे कि मैं डिप्लोमा का कोर्स कर रहा हूँ। बहुत से लोग, यहाँ तक कि मेरे घर में – मेरे…

वक्ता: सरफ़राज़ का सवाल है कि अभी हमसे कहा जाए कि अपने बारे में कुछ लिखो, अपने बारे में कुछ बताओ, अपना विवरण दो – सेल्फ-डिस्क्रिप्शन(आत्म-विवरण), तो हम सोचने लग जायेंगे। सरफ़राज़ पूछ रहे हैं कि अपने बारे में भी लिखने के लिए सोचना क्यों पड़ता है? दो वजहें…

वक्ता: ये बात बिल्कुल ठीक है कि आदमी से आदमी का संबंध होता है और उसी का नाम समाज है| पर असल में ऐसा होता कहाँ है? मैं और आप मिलते हैं, तो हम व्यक्तियों की तरह कहाँ मिलते हैं? मैं होता हूँ, आप होते हैं और समाज होता है|…

प्रश्नकर्ता: सर, मैं ऐसा क्यों हूँ?
आचार्य प्रशांत: हम यह बोलें भी कि यह सब जो है, यह सत्य का प्रस्फुटन (*मैनीफेस्टेशन() है, तो यह जो तुम अपने आस-पास देख रहे हो; गिनो, इसमें कितने रंग हैं? कितने हैं? उठ कर जाने की ज़रूरत नहीं। बस अभी जो…

प्रश्नकर्ता: मैं अपने डर को कैसे तोड़ सकता हूँ? जब तक मुझे बाहरी सहायता न मिले, मैं कैसे अपने ही द्वारा बनाए गए खेलों से, अपनी सीमाओं से बाहर आऊँ?
आचार्य प्रशांत: जीवन किसी बाहरी सहायता की प्रतीक्षा करने का नाम नहीं है। जीवन किसी ख़ास मसीहा के स्वागत के…

प्रश्नकर्ता: सर, बचपन से सुनते आए हैं ‘स्वयं से पहले सेवा’। पर यहाँ आकर सुना कि ‘सेवा से पहले स्वयं’। तो सर ये…
आचार्य प्रशांत: तो फँस गए!
प्र: हाँ, सर।

प्रश्न: सर, हम ‘चरित्र’ शब्द का अर्थ जानना चाहते हैं|
वक्ता: अभी! आजकल शायद मौसम ही चल रहा है चरित्र(कैरेक्टर) का|
(सभी श्रोतागण हँसते हैं)

वक्ता: यह जो हमारा मस्तिष्क है, यह करीब-करीब एक यंत्र है। सच तो यह है कि हम निन्यानवे प्रतिशत यंत्र ही हैं और जैसे एक यंत्र की पूरी-पूरी प्रोग्रामिंग रहती कि वो क्या करेगा और क्या नहीं करेगा, ठीक उसी तरीके से हमारी भी पूरी-पूरी प्रोग्रामिंग रहती है, जिसे हम…

वक्ता: विवेक का सवाल है कि हम अपनी कमजोरियों को कैसे जान सकते हैं| कैसे पता कि कुछ कमज़ोरी है? कैसे पता कि कुछ कमी है ही तुममें?
तुम एक ऐसे देश में पैदा हुए जिसके मन से अभी भी अंग्रेजों कि ग़ुलामी गयी नहीं है| तो यहाँ पर अभी…

प्रश्नकर्ता: आप ये जो बातें बताते हैं वो एक व्यक्ति के लिए तो सही हैं, वो इनको व्यवहार में ला सकता है, या सीख सकता है, अंदर से खुद ऐसा बना सकता है, लेकिन एक समूह में आने के बाद वो सारी बातें निरर्थक-सी हो जाती हैं। तो ये अलग…

आचार्य प्रशांत: तुम्हारे पास बात ऐसे पहुँचती है कि तुमने मुझसे सुन लिया। मेरे पास कहाँ से आती है?
प्रश्नकर्ता: सोचकर।
आचार्य: नहीं, सोचकर नहीं आती है, मुँह काला करके आती है। अभी मेरी शक्ल देख रहे हो? झुल्साई-सी दिख रही है? नहीं दिख रही होगी क्योंकि तुमने मुझे पहले

आचार्य प्रशांत: दिनेश का सवाल है कि मन सभी का अधिकतर गलत कार्यों की तरफ ही क्यों भागता है। मन कैसे ऐसा कर ले कि उधर को ना जाए?
यदि मन को साफ़-साफ़ पता ही हो कि कुछ गलत है, तो उधर जाएगा नहीं। मन उधर को ही जाता है…

प्रश्न: सर, मैं वर्तमान में कैसे जियूँ, बिना भविष्य के बारे में सोचे?
वक्ता: जो है, सामने ही है| उसमें ‘कैसे’ का प्रश्न क्या है? तुम पूछ रहे हो कि कैसे वर्तमान में जियूँ, कैसे न भटकता रहूँ भविष्य में|

वक्ता: बहुत अच्छा सवाल है। आपका नाम क्या है?
श्रोता १: रोहित।
वक्ता: रोहित पूछ रहे हैं, ‘स्वीकृत’ और ‘सम्यक’ में क्या अंतर है? और आप में से जो भी लोग आज कुछ भी ना समझ पाएं बस इस सवाल को समझ लें, उन्हें दिख जाएगा कि वो बुद्धिमानी से

वक्ता: अगर हम दो चरों वेरिएबल्स की बात करें ‘अ’ और ‘ब’, जिनका हमें कुछ पता नहीं कि ये सम्मिश्र संख्या *(*काम्प्लेक्स नंबर) हैं, वास्तविक संख्या हैं या काल्पनिक संख्या, घनात्मक संख्या है, या ऋणात्मक संख्या हैं (कि काम्प्लेक्स है कि रियल है, कि पॉजिटिव है कि निगेटिव…

आचार्य प्रशांत: एक उपनिषदिक् वाक्य है;
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
जो बलहीन है वो कभी भी अपने करीब नहीं पहुँच सकता। जो इतना डरपोक, मुर्दा और निर्बल है कि उसको अंतर पड़ने लग जाए कि दस लोग क्या बात कर रहे हैं इधर-उधर की, उसके बस की ये सब बातें नहीं

वक्ता: हममें से कितने लोग हैं जिनके लिए ये सवाल कभी ना कभी महत्वपूर्ण हो जाता है, “*कैसे दूसरे को प्रभावित कर दूँ*?”
{सभी हाथ उठाते हैं}
वक्ता: इसका मतलब यह है कि यह सवाल हममें से सभी का है। तो हम इसे सुनेंगे भी ऐसे जैसे

वक्ता: तुमने बड़ी ख़ूबसूरत बात कही कि जो कुछ है वो बाहर से है। ठीक-ठीक देख पा रहे हो कि मन में जो कुछ भरा हुआ है वो दूसरों का दिया हुआ है और दिया ही नहीं है, देने में तो ऐसा लगता है किसी ने तुम पर कुछ उपकार…

आचार्य प्रशांत: सवाल है, ‘कुछ भी करने में एक डर क्यों बना रहता है कि कोई और मेरे विषय में क्या सोचेगा?’ ये डर सिर्फ कुछ स्थितियों में नहीं होता हमारे जीवन में। सच तो ये है कि हमारा जीवन ही डर बनकर रह गया है। एक-एक कदम जो लिया…

प्रश्न: सर, अपने कहा कि बाहर से जो कुछ भी मिल रहा है, उसमें और अपनी दृष्टि में भेद करना सीखो। पर सर इतना घुल मिल गए हैं कि पता ही नहीं चलता कि बाहरी क्या है और भीतरी क्या है। पता ही नहीं चलता कि समाज ने क्या दिया…

प्रश्न: सर, आपने जैसा कहा कि किसी का गुलाम नहीं होना चाहिए। जो रहो खुद रहो। क्या ये संभव है कि एक समाज में रह कर हमारे ऊपर समाज का फर्क ना पड़े, अपने परिवार या माता पिता के कोई फर्क ना पड़े? क्या ये पूरी तरह से संभव है?…

प्रश्न: सर, असल में होता क्या है कि कुछ बातों से हम सम्बद्ध हो पाते हैं, तो उसे अमल भी कर पाते हैं लेकिन कई बातें ऐसी हैं जो सिर्फ लेक्चर तक ही रह जाती हैं, मतलब की वो सिर्फ़ बातें बन कर ही रह जाती हैं ।
वक्ता: बिल्कुल…

वक्ता: तुम्हारा होना ही दूसरों से अलग है। अपने होने को पहचानते हो न? किसी और के होने को भी जान सकते हो क्या? तुम्हारा होना ही तुम्हें दूसरों से अलग बनाता है। तुम्हारे बाकि सारे गुणों की नकल हो सकती है। जो कुछ भी तुम करते हो कोई और…

वक्ता: दुनिया वास्तव में बहुत सुन्दर है। पर हमें उसकी सुन्दरता कहाँ पता चलती है। तुम तो एक विरोध खड़ा कर रहे हो। तुम कह रहे हो कि इस सुन्दर दुनिया में जाएँ या अपने साथ लगे रहें। तुमने ज़बरदस्ती एक बंटवारा कर दिया है, ये बंटवारा कुल ही निरर्थक…
~ अष्टावक्र गीता
आचार्य प्रशांत: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास करता है और समस्त भूत उसमें हैं, तब ये बड़े आश्चर्य की बात है कि अभी भी उसमें ममत्व बचा रहे। जिस मुनि…
आचार्य: बहुत सुंन्दर, मतलब क्या है इसका?
प्रश्नकर्ता: सर, वैसे तो हमारे…
प्र: पूरा।
आचार्य: और जानना। तो, बोध स्वभाव है, और पूर्णता स्वभाव है।
कुछ बोला मैंने और समझ गए, तब कैसा…
वक्ता: लोकेन्द्र,…
आचार्य: मैं तुम्हें जो जवाब दे रहा हूँ वो मेरी तरफ़ से श्रेष्ठ जवाब…
(अष्टावक्र गीता, १८.७४)
आचार्य…
वक्ता: तो वही तो कह रहा हूँ,
मूल अंतर बस दो हैं- ‘…